सोहराय पर्व के पहला दिन :उम (Um) — शुद्धि, स्नान और गोड़ैत द्वारा देवताओं का आह्वान
अगर आप झारखंड, बंगाल या ओडिशा के आदिवासी अंचलों, विशेषकर संथाल परगना की माटी से जुड़े हैं, तो ‘सोहराय’ शब्द सुनते ही आपके मन में मांदर की थाप और धान की नई बालियों की महक ताज़ा हो गई होगी। जोहार! आज हम एक बहुत ही गहरे और पवित्र विषय पर बात करने जा रहे हैं। हम बात करेंगे उस दिन की, जब प्रकृति और पशुओं के इस महापर्व की असली शुरुआत होती है। जी हाँ, आज का हमारा विषय है सोहराय प्रव के पहला दिन :उम (Um)।
अक्सर हम त्योहारों की चकाचौंध में उनके पीछे छिपे गहरे दार्शनिक और आध्यात्मिक अर्थ को भूल जाते हैं। एक शोधकर्ता और संस्कृति प्रेमी के तौर पर, मैंने पिछले 15 वर्षों में आदिवासी परंपराओं को बहुत करीब से देखा और महसूस किया है। सोहराय केवल नाच-गान नहीं है; यह एक अनुशासन है, एक ‘सिस्टम’ है जो समाज को प्रकृति और ईश्वर से जोड़ता है।
आइए, गहराई से समझते हैं कि सोहराय का पहला दिन, जिसे ‘उम’ (Um) कहा जाता है, असल में क्या है और इसमें गोड़ैत (Godet) की भूमिका इतनी अहम क्यों होती है।
उम (Um) क्या है? : सिर्फ स्नान नहीं, यह पुनर्जन्म है
जब हम सोहराय प्रव के पहला दिन :उम (Um) की बात करते हैं, तो बाहरी दुनिया के लिए इसका अर्थ ‘स्नान’ या ‘नहाना’ हो सकता है। लेकिन अगर आप संथाल संस्कृति की गहराई में उतरेंगे, तो पाएंगे कि ‘उम’ का अर्थ केवल शरीर को पानी से धोना नहीं है। यह आत्मा, मन और घर-आंगन के शुद्धिकरण की एक विस्तृत प्रक्रिया है।
मेरे एक बुजुर्ग मित्र, जो संथाल परंपराओं के जानकार हैं, उन्होंने मुझे एक बार बहुत ही सुंदर बात कही थी— “शरीर तो रोज़ नहाता है, लेकिन सोहराय के पहले दिन हम अपने ‘गाँव’ और अपने ‘देवताओं’ को नहलाते हैं।”
शुद्धि की प्रक्रिया (Purification Process)
इस दिन की शुरुआत भोर की पहली किरण के साथ ही हो जाती है। पूरा गाँव एक अलग ही ऊर्जा से भरा होता है।
- घर की लिपाई-पुताई: उम के दिन घर की महिलाएं अपने घरों को गाय के गोबर और मिट्टी से लीपती हैं। यह केवल सफाई नहीं है, बल्कि यह घर को ‘पवित्र’ करने की क्रिया है ताकि वहां देवताओं का वास हो सके।
- कपड़ों की सफाई: साल भर के पुराने मैल को धोकर, नए वस्त्र या पूरी तरह से स्वच्छ वस्त्र धारण करने की तैयारी इसी दिन होती है।
- उपवास और संयम: घर के पुरुष सदस्य, विशेषकर जो पूजा में भाग लेते हैं, वे पवित्रता का कड़ाई से पालन करते हैं।
यह दिन हमें याद दिलाता है कि किसी भी बड़े उत्सव या नई शुरुआत से पहले हमें अपने पुराने विकारों और अशुद्धियों को त्यागना पड़ता है।
गोड़ैत (Godet) : देवताओं और मनुष्यों के बीच का संदेशवाहक
सोहराय के पहले दिन की सबसे रोमांचक और महत्वपूर्ण घटना होती है ‘गोड़ैत’ की सक्रियता। अगर आप नहीं जानते कि गोड़ैत कौन है, तो इसे आसान भाषा में समझिए— वे गाँव के संदेशवाहक भी हैं और धर्म के प्रहरी भी।
जब सोहराय प्रव के पहला दिन :उम (Um) की रस्में शुरू होती हैं, तो गोड़ैत की भूमिका किसी सेलिब्रिटी से कम नहीं होती। उनका काम केवल सूचना देना नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा को जगाना है।
गोड़ैत का ‘आह्वान’ कैसे होता है?
गोड़ैत का मुख्य कार्य गाँव के हर घर तक यह संदेश पहुँचाना है कि अब पूजा का समय हो गया है और देवताओं को आमंत्रित करना है।
- घर-घर जाना: गोड़ैत गाँव के हर घर में जाते हैं। यह दृश्य देखने लायक होता है। वे खाली हाथ नहीं जाते, और न ही खाली हाथ लौटते हैं।
- सामग्री संग्रह: हर घर से वे पूजा के लिए आवश्यक सामग्री जैसे चावल, मुर्गा, या अन्य चढ़ावा इकट्ठा करते हैं। यह ‘सामूहिकता’ (Community Bonding) का एक बेहतरीन उदाहरण है। कोई भी व्यक्ति अकेले पूजा नहीं करता; पूरा गाँव मिलकर योगदान देता है।
- देवताओं को निमंत्रण: गोड़ैत का सबसे महत्वपूर्ण काम है ‘नायके’ (पुजारी) के साथ मिलकर जाहिर थान (पवित्र स्थल) में देवताओं—विशेषकर ‘मरांग बुरु’ (Marang Buru) और ‘जाहिर एरा’ (Jaher Era)—को आमंत्रित करना।
मेरा अनुभव कहता है कि गोड़ैत उस अदृश्य धागे की तरह हैं जो पूरे गाँव को एक माला में पिरो कर रखते हैं। उनके बिना सोहराय की कल्पना भी अधूरी है।
जाहिर थान और ‘गोंड़’ पूजा (The Ritual at the Sacred Grove)
स्नान और सामग्री इकट्ठा करने के बाद, असली अनुष्ठान गाँव के बाहर ‘जाहिर थान’ या किसी पवित्र जल स्रोत (नदी/तालाब) के किनारे शुरू होता है। यहाँ सोहराय प्रव के पहला दिन :उम (Um) अपने चरम पर होता है।
नायके (Naike) की भूमिका
गाँव का पुजारी, जिसे ‘नायके’ कहा जाता है, इस दिन उपवास रखते हैं। वे गाँव के सभी पुरुषों के साथ जल स्रोत पर जाते हैं। यहाँ एक विशेष स्थान को गोबर से लीपकर पवित्र किया जाता है।
यहाँ जो पूजा होती है, वह बहुत ही वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक है:
- अरवा चावल का प्रयोग: नायके अरवा चावल को पवित्र स्थान पर रखते हैं।
- अंडे की बलि या परीक्षण: कई जगहों पर इस दिन अंडे का प्रयोग किया जाता है। यह पता लगाने के लिए कि आने वाला साल गाँव और पशुओं के लिए कैसा रहेगा।
- आह्वान मंत्र: नायके अपनी पारंपरिक भाषा में प्रकृति की शक्तियों से प्रार्थना करते हैं कि वे आएं और इस त्योहार में शामिल हों। वे कहते हैं, “हे मरांग बुरु, हमने अपनी फसल काट ली है, हम अपने पशुओं की पूजा कर रहे हैं, आप हमारी रक्षा करें।”
यह क्षण बहुत ही भावुक कर देने वाला होता है। मैंने कई बार देखा है कि कैसे बुजुर्गों की आँखों में इस प्रार्थना के दौरान आंसू आ जाते हैं—यह आंसू कृतज्ञता (Gratitude) के होते हैं।

स्नान : शरीर और मन का मिलन
पूजा संपन्न होने के बाद, सभी पुरुष एक साथ स्नान करते हैं। यह स्नान आम दिनों जैसा नहीं होता। यह ‘उम’ है।
- सामूहिक स्नान: गाँव के सभी लोग एक साथ नदी या तालाब में उतरते हैं। यहाँ कोई ऊंच-नीच नहीं होता। सब एक बराबर हैं।
- शुद्धि का संकल्प: पानी में डुबकी लगाते समय, वे मन ही मन संकल्प लेते हैं कि वे अगले कुछ दिनों तक (जब तक सोहराय चलेगा) पूरी पवित्रता और आनंद के साथ रहेंगे। किसी से झगड़ा नहीं करेंगे और पशुओं की सेवा करेंगे।
जब वे पानी से बाहर निकलते हैं, तो वे केवल भीगे हुए लोग नहीं होते, बल्कि वे ‘सोहराय’ के लिए तैयार हो चुके ‘भक्त’ होते हैं।
पशु धन का महत्व और तैयारी
यद्यपि सोहराय प्रव के पहला दिन :उम (Um) मुख्य रूप से शुद्धि और आह्वान का दिन है, लेकिन इस दिन पशुओं (गाय-बैलों) की अनदेखी नहीं की जाती। आखिर यह त्योहार उन्हीं के लिए तो है!
शाम के समय, जब पुरुष पूजा करके लौटते हैं, तो गोहाल (Cattle Shed) की सफाई की जाती है।
- गोहाल पूजा की तैयारी: बैलों और गायों को भी नहलाया जाता है (या अगले दिन सुबह के लिए तैयार किया जाता है)।
- दीपक जलाना: शाम को गोहाल में और घर के आंगन में दीये जलाए जाते हैं। यह दिवाली जैसा ही लगता है, लेकिन इसका भाव अलग है। यह रोशनी पशुओं के सम्मान में जलाई जाती है, जिन्होंने साल भर खेतों में मेहनत की है।
आज के दौर में ‘उम’ की प्रासंगिकता
एक शोधकर्ता के रूप में, मैं अक्सर सोचता हूँ कि क्या आधुनिकता की दौड़ में हम इन परंपराओं को खो रहे हैं? लेकिन जब भी मैं सोहराय के दौरान गाँवों का दौरा करता हूँ, मेरा विश्वास फिर से दृढ़ हो जाता है।
सोहराय प्रव के पहला दिन :उम (Um) हमें आज के दौर में कुछ बहुत महत्वपूर्ण बातें सिखाता है:
- कृतज्ञता (Gratitude): हम प्रकृति से जो लेते हैं, उसके लिए धन्यवाद देना।
- सामूहिकता (Community): गोड़ैत की प्रथा हमें सिखाती है कि खुशी अकेले नहीं, सबके साथ मिलकर मनाई जाती है।
- पर्यावरण प्रेम: जाहिर थान की पूजा हमें पेड़ों और जल स्रोतों का सम्मान करना सिखाती है।
एक व्यक्तिगत अनुभव
मुझे याद है, कुछ साल पहले मैं दुमका के पास एक गाँव में सोहराय के दौरान रुका था। उम के दिन सुबह-सुबह ठंड बहुत थी। कोहरा छाया हुआ था। तभी दूर से ‘नगाड़े’ की हल्की आवाज़ और गोड़ैत की पुकार सुनाई दी। वह आवाज़ इतनी रूहानी थी कि मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
मैंने देखा कि कैसे लोग अपने-अपने घरों से निकलकर, बिना किसी शिकायत के, ठंडे पानी में स्नान करने जा रहे थे। उनके चेहरों पर एक अजीब सी शांति थी। वह शांति थी—अपने दायित्व को पूरा करने की। उस दिन मुझे समझ आया कि आदिवासी संस्कृति इतनी महान क्यों है। वे प्रकृति से डरते नहीं, उसे पूजते हैं।
निष्कर्ष: सोहराय का आगाज़
तो दोस्तों, सोहराय प्रव के पहला दिन :उम (Um) केवल एक रस्म नहीं, बल्कि एक भावना है। यह तैयारी है उस महाउत्सव की जो अगले 4-5 दिनों तक चलने वाला है। यह दिन हमें सिखाता है कि उत्सव मनाने से पहले पात्र (मन और शरीर) का शुद्ध होना कितना ज़रूरी है।
गोड़ैत द्वारा देवताओं का आह्वान यह सुनिश्चित करता है कि हमारे आनंद में दैवीय आशीर्वाद भी शामिल हो। स्नान करके जब आदिवासी समाज का व्यक्ति बाहर आता है, तो वह अपनी संस्कृति, अपनी मिट्टी और अपने पशुओं के प्रति समर्पित एक नया इंसान होता है।
अगर आप कभी इस समय झारखंड या आसपास के क्षेत्रों में हों, तो इस पहले दिन की पवित्रता को महसूस ज़रूर करें। यह आपको जीवन को देखने का एक नया नज़रिया देगा।
अगले ब्लॉग में हम चर्चा करेंगे सोहराय के दूसरे दिन के बारे में, जहाँ पशुओं की वास्तविक पूजा और ‘डाका’ (Daka) की रस्में होती हैं। तब तक के लिए, अपनी जड़ों से जुड़े रहें और प्रकृति का सम्मान करें।
क्या आपने कभी सोहराय का यह अद्भुत रूप देखा है? अपने अनुभव कमेंट में ज़रूर साझा करें!
जोहार!
Written By :
Churka Hansda
Youtube : https://www.youtube.com/@chansdavlogs
