आदिवासी समाज के लिए ऐतिहासिक और सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम
भारत का संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह भारत के लोकतंत्र, न्याय व्यवस्था और नागरिक अधिकारों का आधार स्तंभ है। यह वह ग्रंथ है जो देश के हर नागरिक को समानता, स्वतंत्रता, न्याय और गरिमा का भरोसा देता है। अब जब भारत का संविधान संथाली भाषा में भी उपलब्ध हो गया है, तो यह सिर्फ एक अनुवाद नहीं, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक विस्तार और आदिवासी सशक्तिकरण का अत्यंत महत्वपूर्ण चरण बन जाता है।
संथाली भाषा में संविधान का प्रकाशित होना उन लाखों आदिवासी नागरिकों के लिए एक नई शुरुआत है, जो लंबे समय से प्रशासन, न्याय और शासन की भाषा को “अपनी भाषा” में समझने की अपेक्षा रखते थे। यह कदम यह दर्शाता है कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था अब केवल कागज़ों में नहीं, बल्कि स्थानीय भाषाओं और समुदायों की वास्तविक आवश्यकताओं के करीब पहुँच रही है।
सरकारी और सार्वजनिक स्रोतों के अनुसार, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 25 दिसंबर 2025 को राष्ट्रपति भवन में ओल चिकी लिपि में भारत के संविधान के संथाली संस्करण का विमोचन किया। यह एक ऐतिहासिक क्षण था, क्योंकि पहली बार भारत का संविधान संथाली भाषा में एक आधिकारिक स्वरूप में सामने आया। यह उपलब्धि न केवल भाषा-सम्मान का प्रतीक है, बल्कि एक मजबूत संदेश भी है कि भारत की विविधता अब शासन और संविधान के स्तर पर भी स्पष्ट रूप से प्रतिबिंबित हो रही है।
संथाली भाषा में संविधान उपलब्ध होने का व्यापक महत्व
संविधान की मूल भावना यह है कि देश का हर नागरिक अपने अधिकारों और कर्तव्यों को जाने, समझे और लोकतंत्र में सक्रिय भूमिका निभाए। लेकिन यह तभी संभव होता है जब किसी नागरिक तक संविधान की बातें उसकी अपनी भाषा में पहुँचें।
भारत में बड़ी संख्या में लोग ऐसे हैं जो हिंदी या अंग्रेज़ी में पढ़ने-समझने में सक्षम नहीं होते या फिर उन्हें कानूनी भाषा जटिल लगती है। विशेषकर आदिवासी क्षेत्रों में, जहाँ शिक्षा और प्रशासनिक संसाधनों की ऐतिहासिक कमी रही है, वहाँ संविधान की भाषा तक पहुँच सीमित रही है।
संथाली भाषा में संविधान का आना इन सीमाओं को तोड़ने वाला कदम है। इससे संथाली भाषी नागरिक अब संविधान के प्रावधानों, अधिकारों और नीतियों को सीधे और स्पष्ट रूप में अपनी मातृभाषा में पढ़ और समझ सकेंगे।
यह पहल भारत के “समावेशी लोकतंत्र” (Inclusive Democracy) की अवधारणा को व्यवहार में उतारती है। संविधान का उद्देश्य केवल कानून बनाना नहीं, बल्कि समाज को एक न्यायपूर्ण और समान दिशा में आगे बढ़ाना है। और जब संविधान की भाषा स्थानीय समुदायों के करीब आती है, तो लोकतंत्र भी जमीनी स्तर पर मजबूत होता है।
2003 में मिला संवैधानिक दर्जा: संथाली भाषा की बड़ी उपलब्धि
संथाली भाषा की संवैधानिक यात्रा भी अपने आप में प्रेरणादायक है। संथाली को 92वें संविधान संशोधन (2003) के माध्यम से भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया। इससे संथाली को भारत की आधिकारिक मान्यता प्राप्त भाषाओं की सूची में स्थान मिला।
आठवीं अनुसूची में शामिल होना केवल प्रतीकात्मक सम्मान नहीं होता। यह भाषा के संरक्षण, विकास, शिक्षा और सरकारी प्रयोग के लिए एक मजबूत संवैधानिक आधार बनाता है। इससे भाषा के लिए साहित्यिक संस्थानों, शैक्षणिक योजनाओं और प्रशासनिक प्रयोग की संभावनाएँ बढ़ती हैं।
संथाली भाषा का यह सम्मान केवल एक भाषा का सम्मान नहीं, बल्कि भारत की उस ऐतिहासिक सच्चाई का स्वीकार है कि आदिवासी समाज इस देश की सांस्कृतिक जड़ों का मूल हिस्सा है
70 लाख से अधिक संथाली भाषी नागरिकों के लिए सीधा लाभ
संथाली भाषा झारखंड, ओडिशा, बिहार, पश्चिम बंगाल और असम सहित कई राज्यों में बड़े स्तर पर बोली जाती है। रिपोर्टों के अनुसार, 70 लाख से अधिक संथाली भाषी लोग इस कदम से सीधे लाभान्वित होंगे।
इसका वास्तविक फायदा केवल “पढ़ने” तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कई व्यावहारिक बदलावों की संभावना बनाता है:
संवैधानिक अधिकारों की जानकारी बढ़ेगी
लोग अब अपने मौलिक अधिकारों, जैसे समानता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता और शिक्षा के अधिकार को बेहतर समझ पाएँगे।
कानूनी जागरूकता में वृद्धि होगी
अनेक बार लोग न्यायालय या प्रशासनिक व्यवस्था से केवल इसलिए डरते हैं क्योंकि उन्हें कानून की भाषा समझ में नहीं आती। मातृभाषा में संविधान उपलब्ध होने से यह दूरी कम होगी।
लोकतांत्रिक सहभागिता मजबूत होगी
जब नागरिक अधिकारों को जानेंगे, तो वे पंचायत, ग्रामसभा, नगर निकाय और चुनाव जैसे लोकतांत्रिक मंचों पर ज्यादा आत्मविश्वास के साथ भाग लेंगे।
सरकारी योजनाओं की समझ बेहतर होगी
कई योजनाएँ संविधान में दिए गए नीति निदेशक तत्वों और सामाजिक न्याय के विचार पर आधारित हैं। संथाली भाषियों के लिए इन्हें समझना अधिक आसान होगा।
यह पहल आदिवासी समाज को “लाभार्थी” नहीं बल्कि “सक्रिय नागरिक” के रूप में आगे बढ़ाने वाली प्रक्रिया है।
पहली बार विधायी विभाग द्वारा प्रकाशित संथाली संस्करण
यह भी महत्वपूर्ण है कि यह संस्करण विधि एवं न्याय मंत्रालय के विधायी विभाग द्वारा पहली बार आधिकारिक तौर पर प्रकाशित किया गया। इसका अर्थ यह है कि यह केवल एक अनौपचारिक अनुवाद नहीं, बल्कि सरकारी स्तर पर मान्यता प्राप्त एक आधिकारिक संस्करण है।

अक्सर भाषाई अनुवादों की सबसे बड़ी चुनौती “सटीकता” होती है। संविधान की भाषा बहुत ही सावधानीपूर्वक चुने गए शब्दों से बनी होती है। किसी भी अनुच्छेद, परिभाषा या अधिकार के अर्थ में मामूली बदलाव भी गंभीर परिणाम ला सकता है।
सरकारी स्तर पर प्रकाशित होने से यह भरोसा मजबूत होता है कि अनुवाद की गुणवत्ता, प्रामाणिकता और कानूनी स्पष्टता का ध्यान रखा गया होगा। इससे संथाली भाषी नागरिकों को एक विश्वसनीय दस्तावेज मिलता है, जिसे वे संदर्भ के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं।
विमोचन समारोह: राष्ट्रपति भवन का ऐतिहासिक अवसर
इस विमोचन का आयोजन राष्ट्रपति भवन में हुआ, जो इस बात का प्रतीक है कि यह पहल केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर का सम्मान और सांस्कृतिक स्वीकृति है।
समारोह में कई प्रमुख लोग शामिल हुए, जिनमें उप-राष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन और विधि मंत्री अर्जुन राम मेघवाल शामिल थे। यह उपस्थिति इस पहल के महत्व को दर्शाती है।
इसके साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसे जनजातीय सशक्तिकरण की दिशा में ऐतिहासिक पहल बताया। यह बयान यह संकेत देता है कि भाषा और संविधान को जोड़कर सरकार एक बड़े सामाजिक परिवर्तन की दिशा में काम कर रही है।
इस तरह, संथाली में संविधान का विमोचन केवल एक पुस्तक जारी करना नहीं था, बल्कि यह एक राष्ट्रीय संदेश था कि भारत की भाषाई विविधता को अब शासन के मूल स्तंभों तक पहुँचाया जा रहा है।
ओल चिकी लिपि और पंडित रघुनाथ मुर्मू का योगदान
संथाली भाषा की पहचान केवल उसके शब्दों में नहीं, बल्कि उसकी अपनी लिपि में भी है। ओल चिकी लिपि संथाली समाज के सांस्कृतिक आत्मसम्मान का सबसे बड़ा प्रतीक मानी जाती है।
ओल चिकी लिपि का विकास पंडित रघुनाथ मुर्मू ने 1925 में किया था। यह लिपि संथाली भाषा को संगठित रूप, साहित्यिक आधार और पहचान देने का ऐतिहासिक प्रयास था।
ओल चिकी का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह आदिवासी समुदाय की भाषा को “लिखित और संरक्षित” करने का माध्यम बनती है। जहाँ किसी भाषा की लिपि होती है, वहाँ साहित्य, शिक्षा, दस्तावेज़ीकरण और भविष्य की पीढ़ियों के लिए संरक्षण की संभावना कहीं अधिक बढ़ जाती है।
रिपोर्टों के अनुसार, यह प्रकाशन ओल चिकी लिपि के शताब्दी वर्ष के अवसर से भी जुड़ा हुआ है। इसलिए इस संविधान संस्करण को पंडित रघुनाथ मुर्मू के योगदान का सम्मान भी माना जा सकता है।
यह एक बहुत सशक्त प्रतीकात्मक संदेश भी है:जब किसी समुदाय की भाषा, लिपि और पहचान को संविधान जैसे सर्वोच्च दस्तावेज में स्थान मिलता है, तो वह समुदाय खुद को राष्ट्र की मुख्यधारा में सम्मान के साथ खड़ा महसूस करता है।
संथाली भाषा: प्राचीन विरासत और जीवित संस्कृति
संथाली भाषा को अक्सर भारत की अत्यंत महत्वपूर्ण भाषाओं में गिना जाता है। यह भाषा ऑस्ट्रो-एशियाटिक भाषा परिवार से संबंधित मानी जाती है और इसे प्राचीनतम जीवित भाषाओं में से एक कहा गया है।
संथाली केवल संवाद की भाषा नहीं है, बल्कि यह अपने साथ एक समृद्ध लोक-साहित्य, गीत, नृत्य, परंपराएँ और सामुदायिक पहचान भी लेकर चलती है। संथाली समाज की लोककथाएँ, पर्व-त्योहार और पारंपरिक ज्ञान इस भाषा के माध्यम से पीढ़ियों तक आगे बढ़ते रहे हैं।
ऐसे में जब संविधान संथाली में उपलब्ध होता है, तो इसका प्रभाव केवल प्रशासनिक नहीं रह जाता। यह भाषा के साहित्यिक और सामाजिक विकास के लिए भी नई संभावनाएँ खोलता है।
संवैधानिक साक्षरता बढ़ाने में नई भूमिका
भारत में “संवैधानिक साक्षरता” (Constitutional Literacy) अब एक आवश्यक आवश्यकता बन चुकी है। यह विचार केवल विद्यार्थियों या कानून के छात्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि हर नागरिक के लिए महत्वपूर्ण है।
संथाली भाषा में संविधान उपलब्ध होने से संवैधानिक साक्षरता कई स्तरों पर बढ़ सकती है:
1)शिक्षा प्रणाली में उपयोग
विद्यालयों और कॉलेजों में संथाली माध्यम से पढ़ने वाले छात्रों को अब संविधान की मूल बातें अधिक सहजता से पढ़ाई जा सकती हैं।
2) ग्रामसभा और स्थानीय संस्थाओं में जागरूकता
आदिवासी क्षेत्रों में ग्रामसभा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। यदि ग्रामसभा के सदस्य संविधान की धाराएँ अपनी भाषा में समझ सकें, तो निर्णय प्रक्रिया अधिक मजबूत होगी।
3) अधिकारों के प्रति आत्मविश्वास
बहुत बार लोग अपने अधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ आवाज नहीं उठाते, क्योंकि उन्हें अधिकारों की स्पष्ट जानकारी नहीं होती। भाषा के माध्यम से यह आत्मविश्वास बढ़ सकता है।
4) लोकतंत्र का वास्तविक विस्तार
लोकतंत्र केवल वोट देने तक सीमित नहीं है। लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब नागरिक शासन की प्रक्रिया में सक्रिय और जागरूक भूमिका निभाएँ
आदिवासी समाज के लिए सांस्कृतिक पहचान और सम्मान का विषय
संथाली समुदाय के लिए यह उपलब्धि केवल “भाषा में पुस्तक” नहीं है, बल्कि यह पहचान, सम्मान और बराबरी के अधिकार का विषय है।
जब कोई आदिवासी नागरिक यह देखता है कि भारत का संविधान उसकी भाषा में उपलब्ध है, तो उसे यह महसूस होता है कि राष्ट्र ने उसकी भाषा और समाज को गंभीरता से स्वीकार किया है। यह मानसिक रूप से सशक्तिकरण का बहुत बड़ा पहलू है।
ऐतिहासिक रूप से आदिवासी समुदायों को अक्सर “दूरस्थ” या “मुख्यधारा से अलग” माना गया। लेकिन संविधान का संथाली में आना यह बताता है कि मुख्यधारा का अर्थ अब केवल शहरों या बड़े भाषाई समुदायों तक सीमित नहीं है।
भविष्य की संभावनाएँ: सिर्फ एक शुरुआत
संथाली में संविधान उपलब्ध होना एक शुरुआत है, लेकिन इससे जुड़ी कई भविष्य की संभावनाएँ भी दिखाई देती हैं:
अन्य प्रमुख सरकारी दस्तावेजों का अनुवाद
जैसे सरकारी योजनाओं की गाइडलाइन, नागरिक अधिकारों से संबंधित पुस्तिकाएँ, न्यायिक प्रक्रियाओं की सरल जानकारी आदि।
डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्धता
यदि यह संस्करण डिजिटल रूप में व्यापक रूप से उपलब्ध होता है, तो मोबाइल और इंटरनेट के जरिए अधिक लोग लाभ ले सकेंगे।
संथाली में कानूनी सहायता और जागरूकता कार्यक्रम
कानूनी सहायता शिविरों, लोक अदालतों और पंचायत प्रशिक्षण कार्यक्रमों में संथाली का उपयोग बढ़ सकता है।
आदिवासी भाषाओं में अन्य संवैधानिक संसाधनों का विस्तार
यह पहल भारत की अन्य आदिवासी भाषाओं के लिए भी एक प्रेरणा और मॉडल बन सकती है।
संथाली भाषा में भारत के संविधान का आधिकारिक प्रकाशन भारत की लोकतांत्रिक यात्रा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ाव है। यह पहल इस बात का प्रमाण है कि भारत अब केवल राजनीतिक रूप से नहीं, बल्कि भाषाई और सांस्कृतिक रूप से भी अपने हर नागरिक को समान अवसर देने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा 25 दिसंबर 2025 को ओल चिकी लिपि में संविधान का विमोचन केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं था—यह एक संदेश था कि संविधान हर नागरिक का है, हर भाषा का है और हर समुदाय के लिए समान रूप से सुलभ होना चाहिए।
संथाली समुदाय के लिए यह ऐतिहासिक क्षण सशक्तिकरण, सम्मान और जागरूकता की नई शुरुआत है। यह कदम आदिवासी समाज को संविधान के करीब लाकर लोकतंत्र को जमीनी स्तर पर मजबूत करेगा।
अंततः यही संविधान की सबसे बड़ी सफलता है—जब वह हर नागरिक तक उसकी भाषा में पहुँच सके, और उसे यह विश्वास दिला सके कि भारत का लोकतंत्र वास्तव में “सबका” है।
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