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कालकोठरी द्वीप: एक रहस्यमयी हिंदी मनोवैज्ञानिक थ्रिलर

कालकोठरी द्वीप

📖 अध्याय 1: बुलावा द्वीप से

8 अगस्त 1976, कोलकाता।

कोलकाता के सीबीआई हेडक्वार्टर में सुबह-सुबह एक गाड़ी आकर रुकी। धूल से सने काले बूट और चमड़े का पुराना बैग लिए अफसर विवेक मिश्रा धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़े। बाल थोड़े बिखरे, आँखों में नींद की जगह पुरानी थकान, और माथे पर एक न मिटने वाला तनाव। उन्हें अभी-अभी एक विशेष मिशन पर भेजा जा रहा था।

“कालकोठरी द्वीप,” ब्रांच ऑफिसर ने फाइल पकड़ाते हुए कहा, “यह बंगाल की खाड़ी में एक छोटी सी चट्टानी जगह है, वहाँ है दीनबंधु मानसिक आरोग्य संस्था। एक मरीज—रुहाना सेन—वहाँ से गायब हो गई है। बिना दरवाज़ा तोड़े, बिना किसी गवाह के।”

“एक मनोरोग संस्था से कोई गायब हो जाए, ये आम बात है?” विवेक ने फाइल पलटते हुए पूछा।

“यह कोई आम संस्था नहीं है, मिश्रा जी,” अधिकारी बोला, “यहाँ वो रखे जाते हैं जो न इंसान में गिने जाते हैं, न कानून में। जो राज्य को असहज करते हैं, या जिन्हें भुला देना बेहतर होता है।”


10 अगस्त 1976, कालकोठरी द्वीप के लिए रवाना

विवेक मिश्रा को जो साथी दिया गया, उसका नाम था आरिफ़ खान—एक नौजवान, तेज़ दिमाग और थोड़े सवाल पूछने वाला अफसर। दोनों को एक पुरानी नाव के ज़रिए भेजा गया, क्योंकि द्वीप तक सीधा हेलीकॉप्टर सेवा बंद थी। कारण? “तूफानी हवाएं और रेडियो सिग्नल में दिक्कत,” ऐसा बताया गया।

“सर, क्या आपने पहले कभी इस द्वीप का नाम सुना था?” आरिफ़ ने पूछा।

विवेक ने सिर हिलाया, “नहीं। और जब तक कोई जगह सरकार के नक्शे में ना हो… समझ लो वहाँ कुछ छिपाया जा रहा है।”


कालकोठरी द्वीप का पहला दृश्य

धुंध के बीच जैसे ही द्वीप का काला किनारा दिखाई दिया, हवा में अजीब ठंडक महसूस हुई। एक टेढ़े-मेढ़े पहाड़ पर बना वह अस्पताल, किसी पुरानी अंग्रेज़ी जेल जैसा लग रहा था—ऊँची दीवारें, कंटीली तारें, और हर कोने पर बंदूकधारी गार्ड।

गेट पर उनका स्वागत किया डॉ. समर दत्त ने—पतला चेहरा, शांत मुस्कान और बोलते समय आँखों में एक गहरी थकान।

“आपका कमरा तैयार है, और हम पूरी जांच में सहयोग देंगे,” डॉ. समर ने कहा, लेकिन उनकी मुस्कान में एक अजीब सी नकली मिठास थी।

विवेक ने चारों ओर देखा। कुछ नर्सें उनके पीछे खड़ी थीं। मरीज अपनी खिड़की से झाँक रहे थे। कोई अपने बाल खींच रहा था, कोई दीवार पर कोड लिख रहा था।

और तभी एक बात ने उनका ध्यान खींचा—वहाँ हर कोई रुहाना सेन का नाम सुनते ही चुप हो जाता था


अध्याय के अंत में…

रात में, जब विवेक अपने कमरे में अकेले थे, उन्हें कमरे के नीचे से किसी के चीखने की आवाज़ आई। वो आवाज़ बार-बार सिर्फ एक शब्द बोल रही थी—

“93… तैतीस नहीं… तिहत्तर नहीं… तिरानवे… 93…”

विवेक बाहर निकले, पर हॉस्पिटल स्टाफ ने उन्हें रोका,
“नीचे का हिस्सा बंद है, सर। सुरक्षा कारणों से। वहाँ कोई नहीं रहता…”

पर आवाज़ आ रही थी… बहुत साफ़… बहुत गहरी… जैसे कोई मदद माँग रहा हो।


📖 अध्याय 2: अदृश्य मरीज और अदृश्य दस्तावेज़

11 अगस्त 1976, सुबह 7:00 बजे – कालकोठरी द्वीप

सुबह की चाय के साथ विवेक मिश्रा अस्पताल के कार्यालय में बैठे थे। खिड़की के बाहर समुद्र की लहरें दीवारों से टकरा रही थीं। बादलों ने सूरज को ढँक रखा था और हवा में भारीपन था, जैसे कोई अनकहा सच तैर रहा हो।

डॉ. समर दत्त, एक बार फिर वही सौम्य मुस्कान लेकर उनके सामने बैठे।

“आप रुहाना सेन की फाइल दिखा सकते हैं?” विवेक ने पूछा।

डॉ. समर ने रिसेप्शन की तरफ देखा, इशारा किया, और एक मोटी, धूल भरी फाइल टेबल पर रख दी गई।

विवेक ने फाइल खोली।
पहला पन्ना — नाम: रुहाना सेन
उम्र: 34
पेशेवर पृष्ठभूमि: पूर्व पत्रकार, राजनीतिक लेखिका
लक्षण: Paranoid schizophrenia, राजनीतिक उन्माद, “राज्य षड्यंत्र” की कल्पनाएँ

“यहाँ लिखा है कि रुहाना को 1974 में भर्ती किया गया था?” विवेक ने सवाल उठाया।

“हाँ, उन्होंने प्रेस के ज़रिए सरकार पर कुछ बहुत संवेदनशील आरोप लगाए थे। और फिर एक दिन अचानक हिंसक हो गईं,” डॉक्टर ने जवाब दिया।

“कैसे हिंसक?”

“उन्होंने एक सुरक्षा कर्मी की आँखें नोच डालीं।”
डॉ. समर की आवाज़ सपाट थी, जैसे वह कोई पुरानी मेडिकल रिपोर्ट पढ़ रहे हों।


जांच शुरू होती है

विवेक और आरिफ़ दोनों ने रुहाना का कमरा देखा।
दरवाज़ा अंदर से बंद था। खिड़की लोहे की जाली से ढकी हुई। कोई सुराग नहीं कि कोई बाहर कैसे गया।

“अगर ये एक महिला मरीज थी, तो उसे नज़र रखने के लिए कैमरे या गार्ड नहीं थे?” आरिफ़ ने चौंक कर पूछा।

“हम मरीजों की निजता का सम्मान करते हैं,” डॉक्टर ने जवाब दिया।

विवेक को कमरे की दीवार पर कुछ अजीब सा दिखा — नाखून से खरोंच कर लिखा गया था:

“ये असली अस्पताल नहीं है… ये एक प्रयोगशाला है…”


पहला सुराग: कोड

रात में विवेक ने रुहाना की फाइल को फिर से पढ़ना शुरू किया। बीच के पन्नों में एक सफेद कागज़ फँसा था—कोई सरकारी मेमो नहीं, न ही मेडिकल रिपोर्ट।

उस पर सिर्फ कुछ लिखा था:

“93-RS-GA-Vault-Truth”

“93… वही आवाज़ जो रात में सुनाई दी थी,” विवेक बुदबुदाए।

“RS मतलब शायद रुहाना सेन… और GA?”
“Vault… यानि तिजोरी? लेकिन अस्पताल में तिजोरी किसलिए?” आरिफ़ ने हैरानी से पूछा।

“या शायद कोई बंद तहखाना, जो सिर्फ कुछ लोगों को पता है,” विवेक ने धीरे से कहा।


दूसरा झटका: अस्पताल का नक्शा

दूसरे दिन, विवेक ने स्टाफ से अस्पताल का पुराना नक्शा माँगा। रिसेप्शन पर काम करने वाली नर्स रीना ने हिचकिचाते हुए एक फाइल सौंपी।

उस नक्शे में तहखाने में सिर्फ दो कमरे दर्शाए गए थे—स्टोरेज और पावर यूनिट।

लेकिन विवेक को किनारे पर पेंसिल से खींची एक हल्की रेखा दिखी—जो “93” नंबर से शुरू होकर अस्पताल के पिछले हिस्से तक जाती थी।

“यहाँ कुछ छुपाया जा रहा है,” विवेक ने बुदबुदाया।


अध्याय के अंत में…

रात को, बिजली चली जाती है। तूफान तेज़ हो चुका है। पूरा अस्पताल बैकअप जनरेटर पर आ गया है।

विवेक और आरिफ़, चुपचाप अपनी जेब में टॉर्च लेकर नीचे के फ्लोर की ओर बढ़ते हैं। स्टाफ को भनक न लगे, इसलिए वो सफेद कोट पहन लेते हैं।

जैसे ही वे तहखाने की तरफ बढ़ते हैं, उन्हें एक मरीज रास्ता रोकता है—बिलकुल शांत, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब चमक है।

वो सिर्फ इतना कहता है:

“अगर तुम सच देखना चाहते हो… तो उस दरवाज़े के पीछे खुद को खो बैठोगे।”


📖 अध्याय 3: 93 नंबर का दरवाज़ा

11 अगस्त 1976, रात 2:14 बजे — तहखाने की ओर

तूफ़ान की आवाज़ अब और ज़्यादा तेज़ हो चुकी थी। अस्पताल की ऊपरी मंज़िलें सन्नाटे में डूबी थीं, लेकिन नीचे तहखाने की ओर जाते सीढ़ियों से लगातार पानी टपक रहा था। दीवारें काई से भरी थीं और हर कदम पर जूते फिसलने को तैयार।

विवेक मिश्रा और आरिफ़ खान, टॉर्च की हल्की रोशनी में आगे बढ़ते रहे।

“कमरे 93 तक कोई सीधा रास्ता नहीं है,” आरिफ़ ने नक्शा देखते हुए कहा।
“ये गुप्त तहखाने की तरह बना है… शायद जानबूझकर?”

“या फिर इसलिए कि वहाँ कुछ ऐसा छिपा है, जो कानून की पहुँच से बाहर रखा गया है।”
विवेक का स्वर अब तीखा हो चला था।


कमरा 93: दरवाज़ा जो जवाब नहीं देता

तहखाने के सबसे अंतिम छोर पर एक लोहे का दरवाज़ा था। उस पर faded paint से लिखा था:
“K-93: Restricted – Authorized Only”

ताले की जगह एक बायोमेट्रिक लॉक था—1976 में ये तकनीक आम नहीं थी। विवेक को हैरानी हुई।

“इतनी आधुनिक सुरक्षा एक मानसिक अस्पताल में?”
“या फिर ये कोई दूसरा संस्थान है, जो बाहर से सिर्फ ‘मानसिक अस्पताल’ दिखता है,” आरिफ़ ने कहा।

दरवाज़े के नीचे से हल्की नीली रोशनी झलक रही थी। अंदर से एक मशीन की आवाज़ आ रही थी—बिलकुल वैसी जैसी किसी प्रयोगशाला में होती है।


गुप्त रास्ता

विवेक ने उस मरीज की बात याद की—”सच देखना है तो खुद को खोना पड़ेगा”।

उन्होंने दीवार पर ध्यान दिया। एक किनारे पर हल्का सा पैनल दिखा, जैसे किसी ने उसे कई बार खोला हो। आरिफ़ ने स्क्रूड्राइवर निकाला। थोड़ी कोशिश के बाद वो पैनल खुल गया।

पीछे एक संकरी सुरंग थी—गंध सीवर जैसी, लेकिन भीतर की हवा साफ थी।

“हम सही जा रहे हैं,” विवेक फुसफुसाए।


कमरा खुलता है… और अंदर का सच

सुरंग उन्हें एक पुराने कमरे में लाती है, जहाँ रखे हैं कई फाइलें, धूल में डूबे कैमरे, और दीवारों पर लगे ब्लैकबोर्ड जिन पर कुछ गुप्त कोड्स और रेखाचित्र हैं।

दीवार पर एक तस्वीर टंगी है—रुहाना सेन, हाथ में माइक्रोफोन पकड़े, जैसे किसी प्रेस कांफ्रेंस में हो।

नीचे लिखा है:
Project GA-93: Neural Reprogramming Trials — Subject #05: Ruhana Sen

“नेयूरल रीप्रोग्रामिंग…? ये कोई मानसिक इलाज नहीं… ये मस्तिष्क को दुबारा सेट करने की कोशिश है।”
आरिफ़ की आवाज़ काँपने लगी।

विवेक ने देखा, एक गुप्त कैमरे की रिकॉर्डिंग मशीन अभी भी चल रही थी।
उन्होंने प्ले बटन दबाया।


रिकॉर्डिंग: रुहाना की आवाज़

“अगर ये वीडियो कभी किसी को मिले, तो जान लेना — ये अस्पताल नहीं, एक ‘शुद्धिकरण केंद्र’ है। यहाँ सरकार उन विचारों को मिटा रही है जो उनके लिए ख़तरा हैं। मेरी पत्रकारिता, मेरी लेखनी… उन्होंने मुझसे सब कुछ छीन लिया। अब मेरी यादें मिटाई जा रही हैं। मेरी पहचान बदल दी जाएगी। मुझे यह स्वीकार करना होगा कि मैं पागल हूँ, ताकि वो मुझे चुप करवा सकें। अगर मैं गायब हो जाऊँ… तो समझ लेना, मैंने कोई अपराध नहीं किया था… मेरा अपराध सिर्फ सवाल पूछना था…”


अध्याय के अंत में…

तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। ज़ोरदार।

कोई स्टाफ नहीं था। ये दस्तक नहीं, जैसे कोई दीवार को पीट रहा हो।

और उस कमरे के दूसरी दीवार के पीछे से एक धीमी आवाज़ आई—

“विवेक…”

विवेक काँप गए। ये आवाज़…
यह स्वाति की थी — उनकी मृत पत्नी।


📖 अध्याय 4: मृत पत्‍नी की पुकार

11 अगस्त 1976, रात 3:02 बजे — कमरा 93 के भीतर

“विवेक…”

दीवार के पीछे से आई आवाज़ ने दोनों अफसरों को जड़ कर दिया।
विवेक के हाथ से टॉर्च गिर पड़ी। अँधेरे में भी वह उस आवाज़ को पहचान सकते थे।

स्वाति।

वही, उनकी पत्नी… जो दो साल पहले एक रहस्यमय आग में जलकर मर चुकी थी।
वही स्वाति, जिसने विवेक से विद्रोह की भाषा सीखी थी… और सरकार के अत्याचारों के खिलाफ लिखा करती थी।

“सर…?” आरिफ़ ने डर और शक के बीच पूछा।

लेकिन विवेक अब जैसे किसी ट्रान्स में थे। उनकी आँखें भटक गई थीं। सांस भारी हो रही थी।


भ्रम या साज़िश?

दीवार की दूसरी ओर एक छोटा-सा स्टील का दरवाज़ा था—बिलकुल सपाट, बिना हैंडल के। लेकिन उसके पास एक स्पीकर और माइक लगा हुआ था।

विवेक ने माइक के पास जाकर धीरे से पूछा, “स्वाति… तुम हो?”

“अगर यह आवाज़ रुक गई, तो मैं भी ख़त्म हो जाऊँगी,” आवाज़ फिर आई, शांत, कंपकपाती।

आरिफ़ अब सख्त हो गया।
“सर, ये ट्रिक भी हो सकती है। इस अस्पताल में सब कुछ कंट्रोल किया जा रहा है।”

विवेक ने पास की दीवार पर हाथ मारा—टकराने से अंदर की गूंज आई, और साथ ही एक और दस्तावेज़ नीचे गिरा।


Project GA-93 — Classified Memo (गुप्त दस्तावेज़)

“Sub: Identity Reconstruction Trials”
Date: Feb 1975
Location: K-93 – Neurological Isolation Unit, Kalakothari Island

“We have initiated neural erasure and identity replacement for Sub-05 (Ruhana Sen) and Sub-06 (Swati Mishra), as per directive from Ministry of Internal Peace. Both subjects exhibit extreme ideological resistance and are ideal candidates for controlled reprogramming. Memory fragments will be preserved as ‘dream states’ to avoid mental collapse.”

विवेक अब काँपने लगे।

“स्वाति… यहाँ है… उसे मृत नहीं दिखाया गया, उसे ‘मरीज’ बना दिया गया!”


बचाव या फँसाव?

आरिफ़ अब संदेह से विवेक को देखने लगा था।
“सर, आप ठीक हैं? कहीं ये सब आपके भ्रम तो नहीं?”

विवेक ने आरिफ़ की ओर देखा—उसके चेहरे पर अब शक था, आँखों में अविश्वास।

“तुम भी उन्हीं में से हो क्या?” विवेक ने सवाल दागा।

“क्या मतलब?”

“मुझे यहाँ भेजने का मकसद ही ये था… कि मैं वापस कभी बाहर न जा सकूँ?”

आरिफ़ कुछ कहने ही वाला था, तभी अस्पताल का सायरन बजा।
Emergency lockdown.


बाहर निकलने का रास्ता बंद

सभी दरवाज़े लॉक हो चुके थे। पावर कट हो गया। जनरेटर की आवाज़ भी बंद।

विवेक और आरिफ़ अब फँसे थे—कमरा 93 के अंदर।

बाहर अस्पताल के गार्ड पैदल दौड़ रहे थे। कुछ कोड में चिल्ला रहे थे—“Subject-06 has breached containment!”

“Subject-06…? वो तो स्वाति है!” विवेक चिल्लाए।


अध्याय के अंत में…

विवेक ने अचानक देखा—कमरे के एक कोने में, दीवार के पीछे से, एक दरार बन गई थी।

वहां से किसी महिला की परछाईं दिख रही थी।

और फिर वही आवाज़:

“अगर तुम सच में मुझसे प्यार करते हो, तो मुझे यहाँ से निकालो…”

📖 अध्याय 5: डॉक्टर समर का सच

11 अगस्त 1976, रात 4:03 बजे — कमरा 93 के भीतर

कमरे की दरार से दिख रही वह परछाईं कुछ कह रही थी, पर आवाज़ अब पूरी तरह स्पष्ट नहीं थी। विवेक उसे छूने के लिए आगे बढ़े, लेकिन दीवार जैसे किसी मोटे काँच से बनी थी—जो दिखती तो थी, लेकिन पार नहीं होती।

“स्वाति…”
विवेक की आवाज़ में अब गुस्सा नहीं था, सिर्फ एक टूटा हुआ प्रेम था—बिखरा, हारा हुआ।

तभी पीछे से आरिफ़ की कड़कती आवाज़ आई,
“सर! हमारे पास ज्यादा वक्त नहीं है। वे हमारी तलाश में हैं!”

“मैं उसे यहीं नहीं छोड़ सकता…”
“सर, क्या आप वाकई यकीन करते हैं कि वह अभी जीवित है?”
आरिफ़ की आँखों में अब डर नहीं, बल्कि विवेक के लिए चिंता थी।


डॉक्टर समर का अचानक आगमन

कमरे का लॉक अचानक खुलता है।
सामने खड़े हैं डॉ. समर दत्त — सफेद कोट में, दो सुरक्षा गार्डों के साथ।

“बहुत हो गया, मिश्रा साहब,” डॉक्टर ने कहा, “अब समय है कि आप अपनी दवा फिर से लें।”

“मैं मरीज नहीं हूँ!” विवेक चिल्लाया।

डॉ. समर धीरे से मुस्कुराए। उन्होंने जेब से एक पुरानी फाइल निकाली और टेबल पर फेंकी।

Subject File: V-07 — Vivek Mishra
Status: Delusional Dissociative Identity Disorder (DDID)
Previous Identity: Rajdeep Banerjee


सच… या एक और झूठ?

फाइल के अंदर के दस्तावेज़ बताते हैं:

  • विवेक असल में राजदीप बैनर्जी हैं — एक राजनीतिक उग्रवादी, जिसने सरकारी कार्यालय में विस्फोट किया था।
  • उसने अपनी पत्नी स्वाति की हत्या कर दी थी जब उसने उसे आत्मसमर्पण के लिए कहा।
  • बाद में, अपराधबोध के कारण उसका दिमाग टूट गया। उसने खुद को “CBI अफसर विवेक मिश्रा” मान लिया और यह विश्वास कर लिया कि उसकी पत्नी मारी नहीं गई, बल्कि उसे किसी षड्यंत्र के तहत छिपा दिया गया।

“तुमने अपनी पत्नी को मारा, राजदीप। और फिर तुम्हारी यादें बिखर गईं। हम तुम्हें पहचान दिलाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन तुम हर बार नई कहानी गढ़ लेते हो,” डॉक्टर समर ने शांत स्वर में कहा।


आरिफ़ की असली पहचान

“तो आरिफ़ भी…?”
“हाँ,” डॉक्टर ने कहा, “आरिफ़ खान इस संस्था का जूनियर चिकित्सक है। हर बार जब तुम अपने ‘सीबीआई मिशन’ की कल्पना करते हो, वह तुम्हारा साथी बन जाता है। ताकि तुम धीरे-धीरे सच को स्वीकार कर सको।”

आरिफ़ की आँखें अब नम थीं।
“सर… हम सब चाहते हैं कि आप ठीक हो जाएं। पर हर बार आप हमें दुश्मन समझते हैं।”


टूटते भ्रम, बढ़ता सन्नाटा

विवेक अब चुप थे।

उनकी स्मृतियाँ एक-एक कर धुंध में खोने लगीं।

  • वो आग में जलती हुई स्वाति…
  • अपने हाथ में बम लेकर भागता कोई व्यक्ति…
  • और अस्पताल में बार-बार आता एक ही सपना—“मैं कोई और हूँ”

अध्याय के अंत में…

विवेक को एक इंजेक्शन दिया जाता है।
धीरे-धीरे उसकी आँखें बंद होने लगती हैं।
पर आखिरी शब्द जो उसके कानों में गूंजते हैं—

“अगर झूठ में जीना सुकून देता है, तो क्या वो झूठ ही बेहतर नहीं?”


📖 अध्याय 6: स्मृति या साज़िश?

12 अगस्त 1976 — तड़के सुबह, ऑब्ज़र्वेशन कक्ष, कालकोठरी द्वीप

विवेक मिश्रा अब अकेले एक गहरे सफेद कमरे में हैं। चारों दीवारें चमचमाती, एकदम साफ़—जैसे कोई भावनाओं से रहित मस्तिष्क।
पैरों में बेड़ियाँ नहीं, पर चारों ओर कैमरे हैं। उनकी नसों में ट्राय-बी7 नामक एक न्यूरो-सप्रेसेंट इंजेक्ट किया गया है, जो यादों को अस्थायी रूप से स्थिर कर देता है।

“वहां कोई दरवाज़ा नहीं है, सिर्फ़ एक बटन—अगर दबाओगे, तो यह मान लिया जाएगा कि तुम सच को स्वीकार करते हो,” डॉ. समर की आवाज़ इंटरकॉम से आती है।


सवालों का हमला

कमरे की दीवार पर एक प्रोजेक्टर शुरू होता है।

  1. स्क्रीन पर दिखता है एक समाचार लेख — “1974 विस्फोट: जिम्मेदार कौन?”
    तस्वीर: राजदीप बैनर्जी, भगोड़ा।
  2. अगला दृश्य: एक ब्लैक एंड व्हाइट फुटेज — एक महिला, स्वाति, एक सार्वजनिक मंच से बोल रही है —
    “हमारे अंदर का डर ही सबसे बड़ा दुश्मन है। जो सवाल नहीं पूछता, वो ज़िंदा नहीं…”
  3. फिर एक अंतिम चित्र — अस्पताल की फाइल, जिसमें लिखा है:
    Patient ID: V-07 | Diagnosis: Reality Resistance Syndrome

विवेक की जंग — भीतर से

विवेक की आँखें बंद हैं।

लेकिन भीतर उसके मस्तिष्क में दो आवाजें टकरा रही हैं:

  • आवाज़ 1:
    “स्वाति को तुमने मारा… यही सच्चाई है। अपने अपराध को स्वीकार कर लो। इससे छुटकारा मिलेगा।”
  • आवाज़ 2:
    “तुम्हारी यादें असली हैं। तुम जिंदा हो, सच बोलते हो। ये संस्था तुम्हारे विचारों को मिटाना चाहती है।”

विवेक अब बीच में फँसा है — अपराधबोध और विद्रोह के बीच।
वो जानता है… अगर उसने स्वीकार कर लिया कि वो राजदीप है, तो सब खत्म।

पर अगर वो नहीं माने… तो क्या कभी बाहर निकल पाएगा?


पुनर्जन्म या आत्म-समर्पण?

कमरे में अचानक एक कागज़ आता है—दिवार से लगी एक खिड़की से।

उस पर सिर्फ एक वाक्य लिखा है:
“तुम्हें वही बनना होगा, जिसे ये दुनिया झूठा मानती है—ताकि तुम अपनी सच्चाई ज़िंदा रख सको।”

विवेक उठते हैं, कांपते हाथों से वह बटन देखते हैं।

कुछ सेकंड बीतते हैं…
वो बटन दबा देते हैं।


फिर वही सफेद कोट… फिर वही द्वीप

एक हफ्ते बाद।
डॉ. समर एक नए मरीज को घुमा रहे हैं।

सामने एक शांत, नियंत्रित, मुस्कुराता हुआ व्यक्ति है—विवेक मिश्रा, जो अब अस्पताल का सबसे “सुधरा हुआ” मरीज है।

वह हर सवाल का जवाब देता है:
“मैं राजदीप बैनर्जी हूँ। मैं भ्रम में था। अब मैं ठीक हूँ।”

पर जब रात आती है, और कमरे में अंधेरा होता है—वह खिड़की के पास बैठकर एक चिट्ठी लिखता है।

“मुझे लगता है, मैंने सच को दबा दिया है। लेकिन सच जानता है कि मैं कौन हूँ। अगर कोई बाहर है, तो मुझे ढूँढना मत… इस द्वीप पर सिर्फ सन्नाटा ही सच्चा है।”
– विवेक / राजदीप


📖 अध्याय 7: आख़िरी दस्तक

18 अगस्त 1976 – रात 3:17 बजे, कालकोठरी द्वीप

तेज़ हवाओं और मूसलधार बारिश के बीच द्वीप की बिजली गुल हो चुकी है।

ऑडिटोरियम ब्लॉक में सुरक्षा अलार्म बंद हैं। एक मरीज—अर्पण घोष, जो पिछले सात सालों से मूक बना हुआ था—आज पहली बार चीखता है:
“रुहाना वापस आ गई है!”


वापसी या भ्रम?

सुरक्षा कैमरों में एक परछाईं दिखाई देती है। लंबे बाल, सफ़ेद साड़ी, और उसके हाथ में एक जलता हुआ लैंप।

डॉ. समर और नर्सिंग स्टाफ मानते हैं ये एक hallucination है—मरीज़ों का सामूहिक भ्रम।

पर तभी लेब सेक्शन की फाइल रूम से कुछ चोरी होता है:
Case File No. V-07 — Vivake Mishra / Rajdeep Banerjee

डॉ. समर घबराते हैं।
“ये सिर्फ़ पागलपन नहीं, कोई हमारी परतों में घुस आया है…”


रुहाना सेन – वह कौन थी?

रुहाना, जो पाँच साल पहले यहाँ रिसर्च असिस्टेंट थी, एक दिन अचानक लापता हो गई थी।
कहते हैं, उसने “Project Moksha” नाम की फाइल चुराने की कोशिश की थी।

पर अब… रात 3:30 पर, एक नर्स दावा करती है कि उसने रुहाना को पुराने रिकॉर्ड रूम में देखा—वही आँखें, वही लाल डायरी।


विवेक की दूसरी आँखें

अब विवेक मिश्रा (या कहें “राजदीप”) अस्पताल की दिनचर्या में पूरी तरह शामिल है।

वो कागज़ के फूल बनाता है। दूसरों से मुस्कुरा कर बात करता है।

पर जब वह अकेला होता है, तो कमरे की दीवार पर ‘R.S.’ लिखता है—रुहाना सेन।

उसके पास कोई डायरी नहीं, पर उसका दिमाग एक रिकॉर्डर है।
हर बात, हर हावभाव, हर सुरक्षा गार्ड की चाल को वह नोट कर रहा है।

उसके मन में एक योजना है।


Project Moksha – मोक्ष या मृत्यु?

रुहाना की डायरी के अनुसार, यह एक गुप्त प्रयोग था जिसमें मरीजों की स्मृति मिटाकर “अनुकूल नागरिक” बनाए जाते थे।
उनका अतीत, विचार और विद्रोह—सब मिटा दिया जाता।

विवेक अब समझ गया है—उसे सिर्फ़ अपने सच की रक्षा नहीं करनी, बल्कि इन फाइलों को बाहर ले जाकर दुनिया को दिखाना है।


चुप्पी की साज़िश टूटने वाली है…

अध्याय के अंत में, एक पहरेदार की जेब से चोरी हुआ एक चाबी गुच्छा, और एक स्क्रैपबुक में लिखा एक वाक्य—

“अगर सच को कैद कर लिया जाए… तो क्या वह मर जाता है? या और भी ज़्यादा ज़िंदा हो उठता है?”


📖 अध्याय 8: प्रोजेक्ट मोक्ष का श्मशान

19 अगस्त 1976 – भोर की पहली किरणें, लेकिन द्वीप पर अंधेरा बरकरार

बिजली अब तक बहाल नहीं हुई है।
रात भर कई मरीज जागते रहे, कुछ बड़बड़ाते रहे — “सच लौट आया है…”
डॉ. समर के चेहरे पर पहली बार डर का साया है।


🧪 फाइल V-07 का रहस्य

विवेक (जिसे अब हम राजदीप बैनर्जी कह सकते हैं) ने रुहाना सेन की डायरी और फाइल V-07 दोनों को मिला लिया है।

फाइल में 3 प्रमुख बातें लिखी थीं:

  1. Project Moksha का उद्देश्य:
    मानसिक रोगियों को जबरन electro-shock और psychotropic ड्रग्स देकर उनका पूरा व्यक्तित्व मिटाना, फिर उन्हें “सिस्टम-फ्रेंडली इंसान” बनाकर रिहा करना।
  2. टेस्ट केस – Subject V-07 (Rajdeep Banerjee):
    एक पूर्व पत्रकार जिसने एक शक्तिशाली मंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार का खुलासा किया था।
    उसकी पत्नी को मार दिया गया।
    उसे “मानसिक रूप से अस्थिर” घोषित कर इस द्वीप पर भेज दिया गया।
  3. रुहाना की रिपोर्ट:
    “राजदीप को मत रोको। उसकी यादें मिटाने से पहले उसने सब कुछ काग़ज़ पर उतार लिया है। वो सच जानता है।”

📚 दीवारों पर लिखी गई कहानी

विवेक अब द्वीप की दीवारों पर कोडेड मैसेज छोड़ने लगता है—

  • R.S. = Remember the Source
  • V-07 = Voice of Truth
  • Moksha ≠ Freedom, it’s Death

🧠 डॉ. समर की टूटी हुई परतें

डॉ. समर का अतीत अब खुल रहा है—

  • वो पहले एक सैनिक थे, जो 1965 के भारत-पाक युद्ध में मानसिक आघात के बाद मेडिकल साइंस में आए।
  • उनकी मान्यता थी: “जो इंसान दर्द भूल जाए, वही भविष्य बना सकता है।”

पर जब उन्हें रुहाना ने चुनौती दी थी, उन्होंने उसे “पैरानोइड स्किज़ोफ्रेनिक” कहकर बंद करवा दिया।

अब उन्हें डर है—क्या वो गलती कर चुके हैं?
या सचमुच Project Moksha मानवता की भलाई था?


🔥 डायरी का अंतिम पन्ना

रुहाना की डायरी का अंतिम वाक्य पढ़ते हुए विवेक की आँखें भर आती हैं:

“अगर मैं मर भी जाऊँ, तो मेरी कहानी किसी की आवाज़ बन जाए… और वो आवाज़, दीवारों को भी चीर दे।”


⚠️ तूफ़ान से पहले की ख़ामोशी

डॉ. समर को पता चल चुका है कि फाइल चोरी हो चुकी है।

कमांडो यूनिट को बुला लिया गया है।

द्वीप को सील कर दिया गया है।

लेकिन विवेक तैयार है।

उसके पास है एक नक्शा। एक योजना। और अब… कुछ ऐसा जो किसी भी पागलखाने की सलाखें तोड़ सकता है — सच।


📖 अध्याय 9: भाग निकलने की कोई राह नहीं

20 अगस्त 1976 – सुबह 4:00 बजे, मानसून का कहर

बिजली अभी भी गुल है।
तूफान की वजह से समंदर उफान पर है।
द्वीप को बाहर से पूरी तरह सील कर दिया गया है।
लेकिन विवेक के पास सिर्फ एक मौका है।


🗺️ नक्शे का रहस्य

विवेक ने रुहाना की डायरी में छिपी एक आखिरी स्केच से एक पुरानी सुरंग का नक्शा पाया है —
यह सुरंग कालकोठरी संस्थान की बेसमेंट से शुरू होकर पहाड़ी के पीछे एक पुराने चर्च तक जाती है, जो अब खंडहर में बदल चुका है।

रुहाना ने लिखा था:

“अगर कभी तुम्हें भागना हो, तो भगवान के घर से निकलो… क्योंकि इंसान के बनाए दरवाज़े बंद हैं।”


🔦 भागने की तैयारी

विवेक के पास:

  • रुहाना की डायरी
  • फाइल V-07 की कॉपी
  • एक चाकू (मरीज वार्ड से चुराया गया)
  • एक छोटी टॉर्च

💀 सुरंग में मौत का सामना

जैसे ही विवेक सुरंग में दाख़िल होता है, उसे एक सड़ी हुई लाश मिलती है।
गले में पहचान पत्र: “डॉ. गिरीश तिवारी – पूर्व मेडिकल सुपरिटेंडेंट”

रुहाना की डायरी में ये नाम आखिरी बार एक चिट्ठी में लिखा गया था:

“तिवारी सर, अगर आप मुझे रोक नहीं सकते, तो कम से कम मेरी जान लेने से इनकार कर दें।”

क्या डॉक्टर तिवारी ने उसे बचाने की कोशिश की थी और खुद मारे गए?


🕯️ खंडहर में एक अनजान औरत

चर्च के अंदर एक बूढ़ी औरत इंतज़ार कर रही है।

नाम: राखी विश्वास

विवेक: “आप कौन हैं?”

राखी:

“मैं ही थी जो रुहाना को यहाँ लाई थी… और तुम, राजदीप, तुम ही Project Moksha का पहला इंसान हो जो बिना ट्रीटमेंट के खुद को पहचान गया।”


🧠 Project Moksha का मास्टरमाइंड कौन?

राखी विश्वास का खुलासा:

  • असली मास्टरमाइंड कोई और नहीं, डॉ. समर की पत्नी — डॉ. उर्वशी ठाकुर थी।
  • उन्होंने ‘साइकोलॉजिकल पर्सनैलिटी री-कंस्ट्रक्शन’ नाम की एक थ्योरी बनाई थी — इंसान के माइंड को रीसेट करने का तरीका।
  • लेकिन जब उन्हें पता चला कि उनके पति खुद PTSD के शिकार हैं, उन्होंने इस रिसर्च को उनके ऊपर भी आज़माया।

डॉ. समर कभी भी ठीक नहीं हुए। उन्हें लगता था कि वे ही इलाज कर रहे हैं, जबकि वे भी मोहरा थे।


🕯️ अंत में एक धमाका

चर्च के नीचे बारूद रखा गया था।

जैसे ही विवेक और राखी बाहर निकलते हैं —
चर्च जलकर राख हो जाता है।

विवेक की नज़रें राखी पर टिक जाती हैं।

विवेक: “तुमने बारूद लगाया था?”

राखी:

“नहीं बेटा… वो डॉ. समर की आखिरी चाल थी। वो जानता था कि तुम यहीं आओगे।”


🔓 अब क्या?

कोई नाव नहीं। कोई रास्ता नहीं।
तूफान थम चुका है… लेकिन द्वीप अब भी जाल बना हुआ है।

विवेक के पास अब सिर्फ एक विकल्प है — दस्तावेज़ को बाहर पहुँचाना।

लेकिन कैसे?


📖 अध्याय 10: सच का अंतिम चेहरा

20 अगस्त 1976 – सुबह 6:30 बजे | कालकोठरी द्वीप की अंतिम सुबह

तूफान शांत हो चुका है।
समंदर अब थम गया है।
लेकिन विवेक के अंदर का तूफान अब भी तेज़ है।


📄 V-07 फाइल का राज

विवेक ने फाइल V-07 को फिर से पढ़ा —
यह फाइल राजदीप घोष नाम के एक पूर्व पुलिस इंस्पेक्टर पर आधारित है।
उसका मानसिक संतुलन एक केस के बाद बिगड़ गया था जिसमें उसकी पत्नी और बेटी की हत्या एक सिरफिरे अपराधी ने की थी।

V-07 में लिखा था:

“राजदीप को PTSD, डिल्यूज़नल डिसऑर्डर और गिल्ट-इंड्यूस्ड एम्नेशिया है।
उसे यकीन है कि वो अब भी केस सुलझा रहा है।
हम उसे ‘विवेक घोष’ नाम की नई पहचान दे रहे हैं।”

विवेक काँप उठा।
उसने अपनी जेब में रखा ID कार्ड निकाला —
नाम: राजदीप घोष


🧠 क्या वह सच में पागल था?

राखी विश्वास फिर सामने आती है।
विवेक उससे चीखकर पूछता है:

विवेक: “तो क्या मैं… सबकुछ अपनी कल्पना में देख रहा था?”

राखी:

“नहीं। तुम पागल नहीं थे। लेकिन तुमने सच को काट-छांटकर देखा।
यह द्वीप तुम्हारा दर्पण था — जहाँ हर चेहरा तुम्हारे अंदर के किसी हिस्से का प्रतिबिंब था।”


🎭 Project Moksha का अंतिम उद्देश्य

राखी बताती है:

  • इस पूरी प्रक्रिया का मकसद था —
    “मनुष्य को उसके ही अतीत की गहराई में उतारकर उसका सामना कराना।”
  • Project Moksha एक मानसिक प्रयोग था — जिसमें राजदीप घोष को विवेक बनाकर इस द्वीप में डाला गया।
  • यहाँ मौजूद सारे “कर्मचारी” असल में अभिनेता थे।
  • और “डॉ. समर” असल में एक पिछला रोगी था जिसे इलाज के दौरान रिवर्स ट्रिगर बना दिया गया।

📬 सत्य को बाहर भेजने की तरकीब

राखी ने विवेक को एक फ्लेयरे गन दी।

“इस द्वीप पर हर चीज़ देखी जाती है। लेकिन ये गन सरकार के किसी रडार पर नहीं है।
यह जलते ही तीन लाल रंग की चिनगारियाँ छोड़ेगी —
और इसका मतलब होगा कि प्रयोग विफल रहा… और Project Moksha को बंद किया जाए।”


🔥 लाल आसमान

सुबह 7:00 बजे।
विवेक ने अपने हाथ काँपते हुए आकाश की ओर उठाए —
फ्लेयरे गन चलाई।

तीन लाल चिनगारियाँ आसमान को चीरती हुईं ऊपर जाती हैं।


🚁 आखिरी दृश्य

दूर से एक हेलीकॉप्टर उड़ान भरता दिखता है।

राखी मुस्कुराती है —

“शायद अब समय आ गया है कि यह द्वीप भी अपनी नींद पूरी करे।”


📘 उपसंहार (Epilogue): “स्वतंत्रता की कीमत”

22 अगस्त 1976 – दिल्ली

एक गुप्त रिपोर्ट सरकार को सौंपी जाती है:

“Project Moksha असफल रहा। मानसिक रोगों के इलाज में अतीत को फिर से जीना घातक सिद्ध हुआ।
द्वीप को ‘अनसर्वेड टेरिटरी’ घोषित किया गया है।
सभी कर्मचारियों को अन्य विभागों में स्थानांतरित कर दिया गया है।”


“कालकोठरी द्वीप” समाप्त

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