सोहराय का 5वां दिन: हकू कातकोम (Hako Kaatkom) का महत्व और परंपरा
झारखंड और आसपास के आदिवासी क्षेत्रों में जब धान की बालियाँ सुनहरी हो जाती हैं और हवा में हल्की ठंडक घुलने लगती है, तब आगमन होता है ‘सोहराय’ का। यह केवल एक त्यौहार नहीं है; यह प्रकृति, पशुधन और मानव के बीच के सह-अस्तित्व का एक भव्य उत्सव है। मैंने अपने 15 वर्षों के लेखन और शोध के दौरान कई संस्कृतियों को करीब से देखा है, लेकिन संथाली समाज का यह पर्व जिस तरह से पशु-प्रेम और कृतज्ञता को दर्शाता है, वह अद्वितीय है।
आज हम बात करेंगे इस महापर्व के अंतिम और पांचवें दिन की, जिसे हकू कातकोम (Hako Kaatkom) या ‘हकूकटकम’ कहा जाता है। अक्सर मुख्य उत्सवों की चकाचौंध में अंतिम दिन की रस्में चर्चा से छूट जाती हैं, लेकिन एक शोधकर्ता की दृष्टि से देखें तो यह दिन सामाजिक एकता का सबसे बड़ा उदाहरण है।
आइये, गहराई से समझते हैं कि हकू कातकोम क्या है, इसे क्यों मनाया जाता है और आधुनिक दौर में इसका क्या महत्व रह गया है।
हकू कातकोम (Hako Kaatkom) का शाब्दिक और सांस्कृतिक अर्थ
अगर हम संथाली भाषा के शब्दों को तोड़ें, तो इस दिन का अर्थ बहुत स्पष्ट और सीधा हो जाता है:
- हकू (Hako): मछली
- कातकोम (Kaatkom): केकड़ा
अतः, सोहराय के पांचवें दिन को “मछली और केकड़ा” पकड़ने या खाने के दिन के रूप में जाना जाता है। लेकिन क्या यह सिर्फ भोजन के बारे में है? बिल्कुल नहीं। आदिवासी दर्शन (Tribal Philosophy) में हर रस्म के पीछे एक गहरा संकेत होता है।
चार दिनों तक गाय-बैलों की पूजा (गौ-पूजन), मांदर की थाप पर नृत्य और ‘खूँटाव’ के जोश के बाद, पांचवां दिन जीवन को सामान्य गति में वापस लाने और समुदाय के मनोरंजन का दिन होता है। यह दिन थकावट मिटाने और पूरे गाँव के एक साथ बैठकर भोजन करने (Community Feast) का प्रतीक है।
प्रकृति से जुड़ाव का प्रतीक
मैंने कई बार देखा है कि आदिवासी परंपराएं कभी भी प्रकृति के दोहन की बात नहीं करतीं, बल्कि वे संतुलन की बात करती हैं। हकू कातकोम के दिन गाँव के पुरुष और युवा, पारंपरिक औजारों के साथ नदी, तालाब या नाले की ओर जाते हैं। यह शिकार, व्यापार के लिए नहीं होता; यह केवल उस दिन के सामुदायिक भोज के लिए होता है। यह रस्म हमें याद दिलाती है कि हम अपनी खाद्य आवश्यकताओं के लिए जल-जंगल-जमीन पर निर्भर हैं।
हकू कातकोम की सुबह: रस्में और तैयारी
सोहराय के पांचवें दिन की सुबह अन्य दिनों की तुलना में थोड़ी अलग होती है। पिछले चार दिनों (उम, दका, खूँटाव और जाले) की गहमागहमी के बाद, आज का माहौल थोड़ा सुकून भरा, लेकिन उत्साह से लबरेज होता है।
1. सामूहिक शिकार (Community Fishing)
सूरज उगते ही गाँव के सभी पुरुष—चाहे वो बुजुर्ग हों या बच्चे—एक साथ एकत्रित होते हैं। उनके हाथों में जाल, ‘कुमनी’ (बांस से बना मछली पकड़ने का यंत्र) और अन्य पारंपरिक उपकरण होते हैं। यहाँ एक बात जो मेरा दिल छू जाती है, वह है सामाजिक समानता। इस समूह में कोई ऊँचा या नीचा नहीं होता; गाँव का मांझी (मुखिया) और एक सामान्य किसान, दोनों एक ही तालाब में एक साथ मछली और केकड़े पकड़ते हैं।
2. महिलाओं की भूमिका
जबकि पुरुष शिकार/मछली पकड़ने के लिए बाहर जाते हैं, घर की महिलाएं घर की लिपाई-पुताई और ‘खिचड़ी’ या विशेष चावल पकाने की तैयारी करती हैं। सोहराय के दौरान घरों को चावल के घोल और मिट्टी के रंगों से जिस तरह सजाया जाता है, वह अपने आप में एक कला है। पांचवें दिन भी यह स्वच्छता और पवित्रता बरकरार रखी जाती है।
सामुदायिक भोज: सहभोज की अवधारणा
मछली और केकड़े पकड़ने के बाद, जो दृश्य उभरता है वह मानवता का सबसे खूबसूरत रूप है। पकड़ी गई मछलियों और केकड़ों को किसी एक व्यक्ति के घर नहीं ले जाया जाता, बल्कि इसे पूरे समुदाय के लिए पकाया जाता है।
अक्सर गाँव के ‘मांझी थान’ या किसी खुले स्थान पर आग जलाई जाती है। चावल, दाल और ताजी पकड़ी गई मछलियों/केकड़ों को मिलाकर एक विशेष भोज तैयार होता है।
- स्वाद से बढ़कर सहयोग: इस भोजन का स्वाद शायद किसी फाइव-स्टार होटल की डिश से कम हो सकता है, लेकिन इसमें जो ‘सहयोग’ और ‘भाईचारे’ का मसाला होता है, वह इसे दुनिया का सबसे स्वादिष्ट भोजन बना देता है।
- प्रसाद का रूप: इसे केवल भोजन नहीं, बल्कि सोहराय पर्व का प्रसाद माना जाता है। यह इस बात का संकेत है कि फसल अच्छी हुई, पशु स्वस्थ हैं, और अब हम प्रकृति के अन्य उपहारों (जल जीवों) का सम्मान कर रहे हैं।
हकू कातकोम: उत्सव का समापन और विदाई
हकू कातकोम को सोहराय का समापन दिन माना जाता है। यह एक तरह से मेहमानों और पर्व को विदाई देने का दिन है।
पाहुन (मेहमानों) की विदाई
सोहराय के दौरान बेटियाँ और दामाद विशेष रूप से घर आते हैं। पांचवें दिन, भोज के बाद, उन्हें विदाई दी जाती है। यह पल थोड़ा भावुक होता है। बड़ों का आशीर्वाद लिया जाता है और अगले साल फिर से आने का वादा किया जाता है। एक शोधकर्ता के तौर पर, मुझे यह देखकर हमेशा आश्चर्य होता है कि कैसे एक त्यौहार सामाजिक रिश्तों को इतना मजबूत बना सकता है।
बैलों को वापस काम पर लौटाना
पहले चार दिन बैलों और गायों को पूरी तरह से आराम दिया जाता है, उनकी पूजा की जाती है और उन्हें सजाया जाता है। हकू कातकोम के बाद, जीवन अपनी सामान्य दिनचर्या में लौटने लगता है। यह दिन एक ‘ट्रांजिशन’ (Transition) का काम करता है—उत्सव के उल्लास से वापस कर्म (काम) की ओर।

सोहराय के 5 दिनों का संक्षिप्त अवलोकन
ताकि आप हकू कातकोम के संदर्भ को बेहतर समझ सकें, आइये एक नज़र डालते हैं सोहराय के पूरे चक्र पर। यह समझना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि पांचवां दिन अचानक नहीं आता, यह एक क्रमिक प्रक्रिया का हिस्सा है:
- उम (Um): पहला दिन। स्नान और शुद्धिकरण। गोड़ैत (Godet) द्वारा देवताओं का आह्वान।
- दका (Daka): दूसरा दिन। इस दिन पशुओं को रंगा जाता है और घर की पूजा होती है।
- खूँटाव (Khuntaw): तीसरा दिन। यह सबसे रोमांचक दिन होता है जब बैलों को खूंटे से बांधकर नचाया या खेलाया जाता है।
- जाले (Jale): चौथा दिन। युवा टोलियाँ बनाकर घर-घर जाते हैं, नाचते-गाते हैं और अनाज इकट्ठा करते हैं।
- हकू कातकोम (Hako Kaatkom): पांचवां दिन। सामूहिक मछली शिकार और वनभोज।
हकू कातकोम का समाजशास्त्रीय विश्लेषण (Sociological Perspective)
एक लेखक के रूप में, मैं हमेशा चीजों की तह तक जाने की कोशिश करता हूँ। हकू कातकोम केवल मछली खाने का दिन क्यों नहीं है? इसके पीछे क्या विज्ञान या समाजशास्त्र है?
1. प्रोटीन की आवश्यकता
ऐतिहासिक रूप से देखें तो, फसल कटाई का काम बहुत मेहनत भरा होता है। सोहराय फसल कटाई के ठीक बाद या दौरान मनाया जाता है। लगातार मेहनत के बाद शरीर को पोषण की ज़रूरत होती है। मछली और केकड़ा प्रोटीन और कैल्शियम के बेहतरीन स्रोत हैं। हमारे पूर्वज शायद ‘न्यूट्रीशन साइंस’ नहीं जानते थे, लेकिन वे शरीर की ज़रूरतों को बखूबी समझते थे।
2. सामाजिक तनाव को कम करना (Conflict Resolution)
जब पूरा गाँव एक साथ शिकार करता है और एक ही बर्तन में खाना खाता है, तो आपसी मनमुटाव खत्म हो जाते हैं। ‘हकू कातकोम’ एक अनकहा ‘पीस ट्रीटी’ (Peace Treaty) है। अगर साल भर किसी पड़ोसी से अनबन रही हो, तो आज के दिन साथ में मछली पकड़ते हुए वह दूरी मिट जाती है।
3. जल संरक्षण का संदेश
यह रस्म ग्रामीणों को अपने जल स्रोतों—तालाब, नदी, डोभा—की स्थिति देखने का मौका देती है। जब पूरा गाँव मछली पकड़ने जाता है, तो वे अनजाने में ही अपने जल स्रोतों का निरीक्षण भी कर लेते हैं कि कहीं सफाई या मरम्मत की ज़रूरत तो नहीं है।
आधुनिकता और हकू कातकोम: क्या बदल रहा है?
आज के डिजिटल युग में, जहाँ हम अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं, हकू कातकोम जैसी परंपराएं चुनौतियों का सामना कर रही हैं।
- शहरीकरण का प्रभाव: कई युवा जो शहरों में नौकरी करते हैं, वे सोहराय के लिए घर तो आते हैं, लेकिन पांचवें दिन तक रुकना उनके लिए मुश्किल हो जाता है। इससे सामूहिक शिकार में भागीदारी थोड़ी कम हुई है।
- जल स्रोतों की कमी: गाँवों में तालाबों के सूखने या प्रदूषण के कारण अब मछली और केकड़े उतनी मात्रा में नहीं मिलते जितने पहले मिलते थे।
फिर भी, मैंने देखा है कि संथाली समाज अपनी संस्कृति को लेकर बहुत जागरूक (Resilient) है। जहाँ नदियाँ नहीं हैं, वहाँ लोग बाज़ार से मछली खरीदकर ही सही, लेकिन हकू कातकोम की रस्म को जीवित रखे हुए हैं। यह जज्बा ही इस संस्कृति की असली ताकत है।
निष्कर्ष: एक विरासत जिसे सहेजना ज़रूरी है
सोहराय का पांचवां दिन, हकू कातकोम, हमें सिखाता है कि उत्सव का अंत उदासी के साथ नहीं, बल्कि एक नए जोश और सामूहिक एकता के साथ होना चाहिए। मछली और केकड़ा तो केवल माध्यम हैं; असली उद्देश्य है—साथ मिलना, साथ खाना और साथ मुस्कुराना।
जब हम इन आदिवासी परंपराओं को गहराई से देखते हैं, तो हमें पता चलता है कि वे ‘सस्टेनेबल लिविंग’ (Sustainable Living) के कितने बड़े उदाहरण हैं। हमें इनसे सीखना चाहिए कि खुशी संसाधनों के दोहन में नहीं, बल्कि उनके सम्मान में है।
अगर आप कभी झारखंड आएं, तो कोशिश करें कि सोहराय के समय आएं। और सिर्फ मुख्य दिनों को ही नहीं, बल्कि ‘हकू कातकोम’ के दिन उस शांत, सौम्य और प्रेम भरे माहौल का हिस्सा बनें। यकीन मानिए, वह अनुभव आपके जीवन के सबसे यादगार पलों में से एक होगा।
क्या आपने कभी सोहराय या किसी अन्य आदिवासी पर्व का अनुभव किया है? अपने अनुभव नीचे कमेंट्स में जरूर साझा करें। हमें आपकी कहानियाँ पढ़ना अच्छा लगेगा!
Written By :
Churka Hansda
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