अमृता प्रीतम की अधूरी मोहब्बत

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साहिर लुधियानवी के लिए उनका अधूरा प्यार, इमरोज़ की बेपनाह मोहब्बत और 1947 के बँटवारे का दर्द

हाँ, तो चलिए आज उस कहानी की परतों को खोलते हैं, जो स्याही और आँसुओं से लिखी गई है। ये कहानी एक ऐसी औरत की है, जिसकी कलम में बग़ावत थी, आँखों में एक अधूरी मोहब्बत का इंतज़ार, और रूह में सदियों का दर्द। ये कहानी है अमृता प्रीतम की।

मैं अक्सर सोचता हूँ, जब हम किसी सितारे को देखते हैं, तो हमें सिर्फ़ उसकी चमक दिखाई देती है। उसके पीछे का अंधेरा, वो जलना, वो टूटना… वो सब नज़र नहीं आता। अमृता की कहानी भी कुछ ऐसी ही है।

एक चीख़ जो नज़्म बन गई

शुरुआत करते हैं उस पल से, जो शायद अमृता की आत्मा का सबसे गहरा ज़ख़्म था। साल था 1947। हवा में बारूद और इंसानी चीखों की गंध थी। मुल्क़ दो टुकड़ों में बँट रहा था और लाखों लोग अपनी जड़ों से उखड़कर अनजान रास्तों पर धकेल दिए गए थे। उसी क़हर के बीच, एक गर्भवती नौजवान औरत, दिल्ली की तरफ़ आ रही एक खचाखच भरी ट्रेन में बैठी थी। उसने अपनी आँखों से वो मंज़र देखा, जिसे शायद क़यामत कहते हैं। लाशें, नफ़रत, औरतों की बेबसी और इंसानियत का जनाज़ा।

उसका दिल बैठा जा रहा था। गोद में एक नई ज़िंदगी पल रही थी और बाहर ज़िंदगी दम तोड़ रही थी। उस दर्द, उस बेबसी के आलम में उसके अंदर से शब्द नहीं, एक चीख़ निकली। एक ऐसी चीख़ जो काग़ज़ पर उतरकर अमर हो गई:

“अज्ज आक्खां वारिस शाह नूँ, कित्थों क़बरां विच्चों बोल, ते अज्ज किताब-ए-इश्क़ दा, कोई अगला वरका फोल।”

(आज मैं वारिस शाह से कहती हूँ, अपनी क़ब्र से बोलो, और आज इश्क़ की किताब का कोई अगला पन्ना खोलो।)

ये सिर्फ़ एक नज़्म नहीं थी। ये बँटवारे के दर्द का राष्ट्रगान था। ये उस 28 साल की लड़की की आवाज़ थी, जो रातों-रात अपनी उम्र से कई दशक बड़ी हो गई थी। ये थी अमृता प्रीतम।

स्याही से दोस्ती, तन्हाई से रिश्ता

लेकिन इस आवाज़ के बनने की कहानी शुरू होती है बहुत पहले, 1919 में गुजरांवाला (अब पाकिस्तान में) की उन गलियों से, जहाँ अमृता का बचपन बीता। उनके पिता, करतार सिंह हितकारी, एक कवि और विद्वान थे। घर में किताबों और शब्दों का माहौल था। पर ये दुनिया तब बिखर गई, जब अमृता सिर्फ़ 11 साल की थीं और उनकी माँ उन्हें हमेशा के लिए छोड़कर चली गईं।

वो रातें शायद बहुत लंबी होती होंगी। एक छोटी सी बच्ची, जो अपनी माँ की गोद में सिमटना चाहती थी, अब तन्हाई की चादर ओढ़कर सोती थी। इसी अकेलेपन में, कलम उसकी सहेली बनी और काग़ज़ उसका हमराज़। उसने लिखना शुरू किया, अपने अंदर के खालीपन को शब्दों से भरने के लिए। 16 साल की उम्र में उसकी पहली किताब छपी, और उसी साल उसकी शादी प्रीतम सिंह से हो गई। उसे अपना सरनेम ‘प्रीतम’ मिला, लेकिन शायद वो प्यार नहीं मिला, जिसकी उसे तलाश थी।

Amrita Pritam love story

एक ख़ामोश इश्क़… और सिगरेट के टुकड़े

दिल्ली आने के बाद, अमृता की ज़िंदगी एक ऐसे मोड़ पर आई, जिसने उनकी शायरी को एक नया मतलब दिया। वो मोड़ था – साहिर लुधियानवी।

ये कोई आम प्रेम कहानी नहीं थी। ये ख़ामोशी की, इशारों की, और बिन कहे अलफ़ाज़ों की कहानी थी। दोनों घंटों साथ बैठते, लेकिन बातें कम होतीं। साहिर एक के बाद एक सिगरेट पीते और अमृता बस उन्हें देखती रहतीं। जब साहिर चले जाते, तो अमृता उन सिगरेट के बचे हुए टुकड़ों को उठा लेतीं, जिनमें साहिर की उंगलियों का स्पर्श और उनके होठों की नमी बाकी होती। वो उन टुकड़ों को अकेले में दोबारा सुलगातीं, और साहिर के एहसास को अपने अंदर महसूस करतीं।

ये एक ऐसा इश्क़ था जो कभी मुकम्मल नहीं हुआ, लेकिन अमृता की रूह में हमेशा ज़िंदा रहा। उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’ में लिखा, “शायद वो मेरा आख़िरी जन्म का महबूब था, जो इस जन्म में मिला तो, पर हमारा हिसाब अधूरा रह गया।” इस अधूरे इश्क़ ने अमृता को वो गहराई दी, जो उनकी नज़्मों में आज भी महसूस होती है।

इमरोज़: वो रंग जो ज़िंदगी में भरने आए

जब दिल साहिर की यादों से छलनी था, तब अमृता की ज़िंदगी में एक और शख़्सियत ने दस्तक दी। वो थे इमरोज़, एक आर्टिस्ट, एक पेंटर। इमरोज़ वो हवा का झोंका थे, जो अमृता की ज़िंदगी की सारी घुटन को अपने साथ उड़ा ले गया।

ये रिश्ता समाज की बनाई किसी परिभाषा में नहीं बंधता था। ये दोस्ती से गहरा, प्यार से ज़्यादा और इबादत जैसा पाक था। इमरोज़ ने अमृता से प्यार नहीं किया, अमृता को जिया। वो घंटों उनके पास बैठे रहते, जब वो लिखतीं। वो उनके लिए चाय बनाते, उनके बिखरे काग़ज़ों को समेटते। उन्होंने अपनी ज़िंदगी के कैनवास पर सिर्फ़ एक ही तस्वीर बनाई – अमृता।

एक क़िस्सा बहुत मशहूर है। इमरोज़ स्कूटर चलाते थे और अमृता उनके पीछे बैठती थीं। अमृता अक्सर उनकी पीठ पर अपनी उंगलियों से कुछ लिखती रहती थीं। वो नज़्में होती थीं, जो उनके ज़हन में आती थीं। एक दिन इमरोज़ ने पूछा, “ये जो तुम मेरी पीठ पर लिखती हो, काश मैं इसे पढ़ पाता।” ये वो मोहब्बत थी, जहाँ एक की पीठ दूसरे के लिए काग़ज़ बन गई थी। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी एक साथ, एक ही छत के नीचे बिना शादी के गुज़ारी, और उनके घर के बाहर नेमप्लेट पर लिखा था – अमृता-इमरोज़।

कलम की बग़ावत और ‘पिंजर’ का दर्द

अमृता सिर्फ़ इश्क़ और जुदाई की शायरा नहीं थीं। वो एक बाग़ी थीं। उनकी कलम ने समाज के दोहरे मापदंडों पर, औरतों पर होती ज़्यादतियों पर और धार्मिक कट्टरता पर जमकर वार किया। उनका नॉवेल ‘पिंजर’ बँटवारे के दौरान औरतों के अपहरण और उनकी त्रासद ज़िंदगी का एक ऐसा दस्तावेज़ है, जिसे पढ़कर आज भी रूह काँप जाती है।

जब उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’ लिखी, तो ادبی दुनिया में हंगामा मच गया। एक औरत का अपनी ज़िंदगी, अपने रिश्तों, अपनी मोहब्बत के बारे में इतनी बेबाकी से लिखना उस दौर में एक बहुत बड़ा गुनाह माना जाता था। लेकिन अमृता को फ़र्क़ नहीं पड़ा। वो वो थीं, जो अपनी शर्तों पर जीती थीं।

सफलता, सम्मान और अंदर का अकेलापन

उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला, ज्ञानपीठ जैसा सर्वोच्च सम्मान मिला, पद्म विभूषण से नवाज़ा गया। दुनिया उनकी क़लम का लोहा मान चुकी थी। लेकिन शोहरत की इस चकाचौंध के पीछे, वो अक्सर अकेली होती थीं। वो उस प्यार को खोजती रहीं, जो रूहानी हो, जो हर बंधन से परे हो। साहिर एक अधूरी प्यास बनकर रह गए, और इमरोज़ उस प्यास को बुझाने वाले समंदर।

अमृता की कहानी हमें सिखाती है कि ज़िंदगी सिर्फ़ सही और ग़लत के तराज़ू पर नहीं तौली जाती। कुछ कहानियाँ एहसास की होती हैं। उनकी कहानी हिम्मत की कहानी है। एक ऐसी औरत की कहानी, जिसने समाज के बनाए पिंजरों को तोड़कर अपनी रूह को आज़ाद किया। उसने प्यार किया तो दुनिया के सामने किया, दर्द सहा तो उसे अपनी कलम की ताक़त बना लिया।

“मैं तैनूं फेर मिलांगी”

ज़िंदगी के आख़िरी सालों में, जब उनका शरीर कमज़ोर हो गया था, इमरोज़ उनकी परछाई बनकर उनके साथ रहे। वो उन्हें एक बच्चे की तरह सँभालते थे। शायद इसी बेपनाह मोहब्बत को महसूस करके अमृता ने अपनी आख़िरी नज़्मों में से एक लिखी, जो उनके जाने के बाद इमरोज़ और दुनिया के लिए एक वादा बन गई:

“मैं तैनूं फेर मिलांगी, कित्थे? किस तरह? पता नई, शायद तेरे तखय्युल दी किरण बण के, तेरे कैनवस ते उतरांगी… या शायद तेरी कैनवस दे उत्ते, इक रहसमयी लकीर बण के, खामोश तैनूं तक्दी रवांगी।”

(मैं तुम्हें फिर मिलूँगी। कहाँ? कैसे? पता नहीं। शायद तुम्हारी कल्पना की किरण बनकर तुम्हारे कैनवास पर उतरूँगी… या शायद तुम्हारे कैनवास पर एक रहस्यमयी लकीर बनकर, ख़ामोशी से तुम्हें देखती रहूँगी।)

31 अक्टूबर 2005 को अमृता इस दुनिया से चली गईं। लेकिन वो गईं कहाँ हैं? वो आज भी अपनी किताबों में ज़िंदा हैं। वो साहिर के लिए लिखी गई हर उदास नज़्म में ज़िंदा हैं। वो इमरोज़ के बनाए हर पेंटिंग में ज़िंदा हैं। अमृता प्रीतम सिर्फ़ एक नाम नहीं, वो एक एहसास है… इश्क़ का, बग़ावत का, और उस हिम्मत का जो सदियों तक औरतों को अपनी आवाज़ ढूँढने की ताक़त देती रहेगी। उनकी कहानी एक रसीदी टिकट की तरह है, जिस पर उनकी ज़िंदगी की पूरी दास्ताँ लिखी है… और वो दास्ताँ अमर है।

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Ravi Shankar

Ravi Shankar is a Bollywood and entertainment journalist at B20masala. He covers the latest news, movie reviews, celebrity stories, and OTT updates from Hindi, Hollywood and South Indian cinema. With a passion for storytelling and pop culture, Ravi brings readers accurate, engaging and in-depth entertainment content since 2018.

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