हेलन नहीं, तो आखिर कौन थी बॉलीवुड की पहली ‘आइटम क्वीन’?
- आमतौर पर लोगों के जेहन में बतौर आइटम डांसर हेलन का नाम सबसे पहले आता है, लेकिन सच कुछ और है.
- साल 1936 में अजूरी नाम की डांसर ने पहली बार परदे पर धमाका किया था.
नमस्कार दोस्तों! मैं हूँ आपका अपना रवि शंकर। पिछले 20-22 सालों से इस ‘फिल्मी दुनिया’ की गलियों की खाक छान रहा हूँ। अनगिनत फिल्में देखीं, ढेरों इंटरव्यू किए और बॉक्स ऑफिस के बनते-बिगड़ते रिकॉर्ड्स का चश्मदीद गवाह रहा हूँ।
आज मैं आपसे एक सवाल पूछता हूँ— जब भी बॉलीवुड में ‘आइटम सॉन्ग’ या ‘कैबरे डांस’ का जिक्र आता है, तो आपके जेहन में सबसे पहला नाम किसका आता है? मुझे यकीन है कि आप में से 99% लोगों के दिमाग में तुरंत लेजेंडरी ‘हेलन’ (Helen) जी की तस्वीर उभर आई होगी। वो ‘पिया तू अब तो आजा’ या ‘मेरा नाम चिन चिन चू’ पर थिरकते उनके कदम! लेकिन मेरे सिने-प्रेमियों, अगर आप सोच रहे हैं कि भारतीय सिनेमा की पहली आइटम डांसर हेलन थीं, तो आप बिल्कुल गलत हैं।
कहानी में दम तो तब आता है जब हम इतिहास के पन्ने पलटते हैं। बॉलीवुड में आइटम सॉन्ग का इतिहास उतना ही पुराना है, जितना खुद हमारा बोलता सिनेमा। तो चलिए, आज मैं आपको टाइम मशीन में बिठाकर ले चलता हूँ उस दौर में, जब ब्लैक एंड व्हाइट स्क्रीन पर पहली बार किसी डांसर ने आग लगाई थी।
पर्दे पर पहला धमाका: साल 1936 और ‘अजूरी’ का जलवा
बात उस दौर की है जब फिल्मों में महिलाओं का काम करना ही किसी टैबू (Taboo) से कम नहीं माना जाता था। साल था 1936। भारतीय सिनेमा अभी अपनी आवाज (Talkies) के साथ प्रयोग कर ही रहा था। उसी दौरान सिल्वर स्क्रीन पर एक ऐसी डांसर का उदय हुआ, जिसने दर्शकों को अपनी उंगलियों पर नचा दिया। उनका नाम था— अजूरी (Azurie)।
अजूरी, जिनका असली नाम अन्ना मेरी गेज़ेलर (Anna Marie Gueizelor) था, एक एंग्लो-इंडियन डांसर थीं। 1936-37 के दौर में आई फिल्मों (जैसे ‘जेंटलमैन डाकू’) में उन्होंने अपने कैबरे और वेस्टर्न डांस मूव्स से तहलका मचा दिया था। अजूरी को भारतीय सिनेमा की पहली आधिकारिक आइटम डांसर (First Item Dancer of Indian Cinema) माना जाता है। उनका डांसिंग स्टाइल इतना बेमिसाल था कि उस जमाने में लोग सिर्फ उनका डांस देखने के लिए सिनेमाघरों के बाहर लाइन लगाया करते थे। अजूरी ने ही वो नींव रखी थी, जिस पर आगे चलकर बॉलीवुड के ‘आइटम सॉन्ग्स’ का पूरा महल खड़ा हुआ।
रबर गर्ल: कुक्कू मोरे (Cuckoo Moray) का दौर
अजूरी के बाद 1940 और 50 के दशक में जिस डांसर ने आइटम क्वीन बनकर राज किया, वो थीं कुक्कू मोरे। फिल्म इंडस्ट्री में उन्हें ‘रबर गर्ल’ कहा जाता था क्योंकि उनके शरीर में गजब की लचक थी।
कुक्कू का स्टारडम ऐसा था कि वो उस जमाने में एक डांस नंबर के लिए 6,000 रुपये चार्ज करती थीं! जी हाँ, 1940 के दशक में 6,000 रुपये आज के करोड़ों के बराबर हैं। राज कपूर की कल्ट क्लासिक फिल्म ‘आवारा’ (1951) हो या ‘शबनम’ (1949), कुक्कू के डांस के बिना फिल्में अधूरी मानी जाती थीं। उनके पास 3-3 महंगी गाड़ियाँ हुआ करती थीं। और सबसे दिलचस्प बात? इसी कुक्कू ने एक यंग कोरस डांसर को फिल्म इंडस्ट्री में ब्रेक दिलाया था, जिसका नाम था— हेलन।

द अल्टीमेट क्वीन: हेलन (Helen) का सुनहरा युग
भले ही हेलन पहली आइटम डांसर नहीं थीं, लेकिन उन्होंने इस कला को जो इज्जत और मुकाम दिलाया, वो कोई और नहीं कर सका। 1958 में आई फिल्म ‘हावड़ा ब्रिज’ (Howrah Bridge) का वो गाना याद है? ओ.पी. नैयर का संगीत, गीता दत्त की आवाज और स्क्रीन पर 19 साल की हेलन— “मेरा नाम चिन चिन चू…”। इस एक गाने ने इतिहास रच दिया।
हेलन की खासियत यह थी कि उनके डांस में कामुकता (Sensuality) तो थी, लेकिन फूहड़पन बिल्कुल नहीं था। 1970 के दशक तक आते-आते हेलन बॉक्स ऑफिस की गारंटी बन चुकी थीं। ‘शोले’ (1975) का ‘महबूबा महबूबा’ हो या ‘डॉन’ (1978) का ‘ये मेरा दिल’, हेलन का स्क्रीन प्रेजेंस इतना पावरफुल था कि कई बार वो लीड हीरोइन पर भी भारी पड़ जाती थीं। उन्होंने 700 से ज्यादा फिल्मों में काम किया।
वैम्प्स का तड़का: बिंदु और अरुणा ईरानी
70 और 80 के दशक में आइटम सॉन्ग का रूप थोड़ा बदला। अब ‘वैम्प’ (Vamp) यानी खलनायिका ही आइटम डांसर भी हुआ करती थी। बिंदु (Mona Darling के नाम से मशहूर) और अरुणा ईरानी ने इस दौर में राज किया। ‘कारवां’ (1971) में अरुणा ईरानी का ‘चढ़ती जवानी मेरी चाल मस्तानी’ आज भी डीजे की पहली पसंद है। उसके बाद पद्मा खन्ना और जयश्री टी. जैसी अदाकाराओं ने इस परंपरा को जिंदा रखा।
मेरा एक निजी किस्सा…
मुझे याद है, 90 के दशक के आखिरी सालों की बात है। मैं एक यंग एंटरटेनमेंट जर्नलिस्ट के तौर पर लेजेंडरी कोरियोग्राफर सरोज खान जी का इंटरव्यू कर रहा था। बातों-बातों में जब आइटम सॉन्ग्स का जिक्र आया, तो ‘मास्टर जी’ (सरोज खान) ने मुझसे कहा था, “रवि, आज की लड़कियां जो कर रही हैं, वो तो हमने कुक्कू जी और हेलन जी से बहुत पहले ही सीख लिया था। अजूरी और कुक्कू ने जिस वक्त कैमरे के सामने कमर मटकाई थी, तब समाज की सोच बहुत छोटी थी। उन औरतों ने असल में आज की आइटम गर्ल्स के लिए रास्ता बनाया है।”
सरोज जी की वो बात मेरे जेहन में आज भी ताजा है। वो सच कह रही थीं। आज जब हम किसी फिल्म के प्रमोशन के लिए करोड़ों के बजट वाले डांस नंबर देखते हैं, तो हमें उस संघर्ष को नहीं भूलना चाहिए जो उन शुरुआती डांसर्स ने झेला था।
90s और 2000s का धमाका: जब आइटम सॉन्ग बना ‘ब्लॉकबस्टर फॉर्मूला’
90 के दशक के अंत में एक बहुत बड़ा बदलाव आया। अब आइटम सॉन्ग फिल्म की कहानी का हिस्सा कम और मार्केटिंग का टूल ज्यादा बन गया।
- मलाइका अरोड़ा: 1998 में मणिरत्नम की ‘दिल से’ आई। चलती ट्रेन के ऊपर शाहरुख खान के साथ मलाइका का ‘छैयां छैयां’ आइकॉनिक बन गया। फिर 2010 में ‘दबंग’ का ‘मुन्नी बदनाम हुई’ आया। इस एक गाने ने फिल्म को 141 करोड़ के बॉक्स ऑफिस कलेक्शन तक पहुँचाने में अहम रोल निभाया।
- कैटरीना कैफ: उसी साल (2010) फिल्म ‘तीस मार खां’ आई। फिल्म भले ही फ्लॉप रही, लेकिन कैटरीना का ‘शीला की जवानी’ रातों-रात नेशनल एंथम बन गया। इसके बाद ‘चिकनी चमेली’ (अग्निपथ) ने थिएटर्स में जो सीटियां बजवाईं, वो हम सबने देखी हैं।
आज नोरा फतेही जैसी इंटरनेशनल टैलेंटेड डांसर्स (‘दिलबर’, ‘साकी साकी’) इस विरासत को आगे बढ़ा रही हैं।
चलते-चलते…
तो दोस्तों, 1936 में अजूरी के उस पहले साहसिक कदम से लेकर आज नोरा फतेही के बेमिसाल बेली डांस तक, भारतीय सिनेमा में आइटम सॉन्ग का सफर एक पूरी सदी की दास्तां बयां करता है। ये सिर्फ गाने नहीं हैं; ये हमारे कमर्शियल सिनेमा की धड़कन हैं। जब भी कोई फिल्म सुस्त पड़ने लगती है, तो एक धांसू आइटम नंबर आकर दर्शकों में करंट दौड़ा देता है।
अगली बार जब आप किसी पार्टी में किसी रेट्रो कैबरे या नए आइटम नंबर पर थिरकें, तो एक पल के लिए ‘अजूरी’ और ‘कुक्कू’ को जरूर याद कीजिएगा, जिन्होंने इस रंगीन सफर की शुरुआत की थी।
आपको बॉलीवुड का कौन सा आइटम सॉन्ग सबसे ज्यादा पसंद है? मुझे कमेंट्स में जरूर बताइयेगा। मैं रवि शंकर, जल्द ही मिलूंगा एक और अनकही फिल्मी कहानी के साथ। तब तक के लिए, सिनेमा देखते रहिए और मुस्कुराते रहिए!
