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सरहुल क्या है? इतिहास, लोककथा

Sarhul meaning & history

सरहुल क्या है? इतिहास, लोककथा और प्रकृति पूजा की एक विस्तृत शोधपूर्ण यात्रा

जब हम भारतीय संस्कृति की बात करते हैं, तो अक्सर हमारा ध्यान बड़े शहरों और मुख्यधारा के त्योहारों पर जाता है। लेकिन, यदि आप वास्तव में भारत की आत्मा को समझना चाहते हैं, तो आपको उन जंगलों और सुदूर गांवों की ओर देखना होगा जहां प्रकृति और मनुष्य का रिश्ता आज भी उतना ही पवित्र है जितना सदियों पहले था। झारखंड, ओडिशा और बंगाल के आदिवासी क्षेत्रों में मनाया जाने वाला ‘सरहुल’ एक ऐसा ही पर्व है। एक शोधकर्ता और सांस्कृतिक अन्वेषक के रूप में, मैंने वर्षों तक इन परंपराओं को करीब से देखा है। आज, इस लेख में हम गहराई से जानेंगे कि सरहुल क्या है, इसका ऐतिहासिक महत्व क्या है, और वे कौन सी लोककथाएं हैं जो इसे इतना अद्वितीय बनाती हैं।

यह केवल एक त्योहार नहीं है; यह मनुष्य की प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का सबसे जीवंत प्रमाण है।

सरहुल का अर्थ और व्युत्पत्ति

सरहुल को समझने के लिए सबसे पहले हमें इसके नाम की गहराई में जाना होगा। भाषाई दृष्टिकोण से और स्थानीय जनजातीय बोलियों (विशेषकर कुड़ुख और नागपुरी) के अनुसार, ‘सरहुल’ शब्द दो शब्दों के मेल से बना है: ‘सर’ और ‘हुल’।

‘सर’ का अर्थ होता है ‘सरई’ या साल (Sal) का वृक्ष, और ‘हुल’ का अर्थ होता है ‘क्रांति’ या ‘पूजा’। कुछ विद्वानों का मत है कि इसका अर्थ ‘साल के फूलों की पूजा’ है। उरांव जनजाति इसे ‘खद्दी’ (Khaddi) कहती है, जिसका अर्थ है ‘फूल’, जबकि मुंडा समुदाय इसे ‘बा-पोरब’ (Ba-Porob) यानी फूलों का त्योहार कहता है। संथाली भाषा में इसे ‘बाहा’ कहा जाता है।

एक अकादमिक नज़रिए से देखें, तो यह त्योहार वसंत ऋतु के आगमन और नए साल की शुरुआत का प्रतीक है। जब साल के पेड़ों पर नए फूल (जिन्हें ‘सरई फूल’ कहा जाता है) खिलते हैं, तब आदिवासी समाज यह मानता है कि धरती माता ने नया श्रृंगार किया है। यह वह समय है जब प्रकृति अपनी पुरानी केंचुल उतारकर नए जीवन का स्वागत करती है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: जड़ों की तलाश

सरहुल क्या है, इसका उत्तर इसके इतिहास के बिना अधूरा है। सरहुल का इतिहास लिखित दस्तावेजों से ज्यादा मौखिक परंपराओं और गीतों में जीवित है। मानवविज्ञानियों (Anthropologists) का मानना है कि सरहुल की परंपरा हजारों साल पुरानी है, संभवतः तब से जब मानव ने खेती करना और बस्तियों में रहना शुरू किया था।

झारखंड के पठारी क्षेत्रों में बसने वाली जनजातियों, विशेषकर उरांव, मुंडा, हो और संथाल के लिए, जंगल ही जीवन का आधार था। ‘सखुआ’ या साल का पेड़ न केवल उन्हें लकड़ी और आश्रय देता था, बल्कि इसके बीज और पत्तों का उपयोग भोजन और औषधि के रूप में भी होता था। ऐतिहासिक रूप से, यह पर्व इस बात का उत्सव है कि कैसे आदिम मनुष्य ने प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व (Co-existence) का पाठ पढ़ा।

मेरे शोध के दौरान, मैंने कई बुजुर्गों से बात की, जिनका कहना है कि सरहुल केवल पूजा नहीं है, बल्कि यह वह दिन है जब “धरती और सूरज का विवाह” होता है। यह एक खगोलीय और कृषि-आधारित घटना का ऐतिहासिक उत्सव है जो फसल चक्र की शुरुआत को चिह्नित करता है।

सरहुल से जुड़ी प्रमुख लोककथाएं (Folklore)

किसी भी प्राचीन परंपरा की तरह, सरहुल भी कई रोचक दंतकथाओं और लोककथाओं से घिरा हुआ है। ये कहानियां पीढ़ी-दर-पीढ़ी गीतों और किस्सों के जरिए आगे बढ़ी हैं। यहाँ दो सबसे प्रमुख लोककथाओं का वर्णन किया गया है जो बताती हैं कि सरहुल क्यों मनाया जाता है।

1. महाभारत और मुंडा जनजाति की कथा

एक बहुत ही प्रचलित लोककथा का संबंध महाभारत काल से जोड़ा जाता है। किंवदंती के अनुसार, जब महाभारत का युद्ध चल रहा था, तो मुंडा जनजाति के लोग भी इसमें शामिल थे। युद्ध के दौरान उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। अपनी रक्षा के लिए, मुंडा योद्धाओं ने घने जंगलों में शरण ली और विशाल साल (Sal) के पेड़ों के पीछे छिप गए।

साल के पेड़ों ने उन्हें दुश्मनों की नज़रों से बचाया। इस घटना के बाद, मुंडा समुदाय के लोगों ने साल वृक्ष को अपना रक्षक माना और उसके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए उसकी पूजा शुरू कर दी। उनका मानना था कि साल के वृक्ष में ‘बोंगा’ (देवता या आत्मा) का वास होता है जो संकट के समय उनकी रक्षा करता है। यही परंपरा आगे चलकर सरहुल के रूप में विकसित हुई।

2. बिंद्रिया और धरती माता की कथा

एक और मार्मिक लोककथा उरांव समाज में प्रचलित है। कहा जाता है कि प्राचीन काल में, एक बार धरती पर भयानक सूखा पड़ा। लोग भूख और प्यास से मरने लगे। तब ‘बिंद्रिया’ नामक एक युवक ने जंगल में जाकर धर्मेश (सूर्य देवता) और धरती माता की तपस्या की।

उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर, साल के वृक्ष पर अचानक फूल खिल उठे, जबकि बाकी जंगल सूखा था। उन फूलों से जीवन का अमृत (पानी और खुशहाली) बरसा और अकाल समाप्त हो गया। तब से यह माना जाने लगा कि साल के वृक्ष में साक्षात धरती माता की उर्वर शक्ति निवास करती है। इस घटना की याद में, हर साल वसंत में जब साल के पेड़ पर फूल आते हैं, तो सरहुल मनाया जाता है।

पूजा विधि और परंपराएं: एक व्यवस्थित अवलोकन

सरहुल की पूजा विधि अत्यंत व्यवस्थित और प्रतीकात्मक है। यह आमतौर पर चैत्र माह (मार्च-अप्रैल) के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है। पूजा का नेतृत्व गाँव का मुख्य पुजारी करता है, जिसे ‘पाहन’ (Pahan) कहा जाता है।

भविष्यवाणी की अनूठी परंपरा

सरहुल की सबसे दिलचस्प और वैज्ञानिक रूप से कौतूहल पैदा करने वाली परंपरा है—बारिश की भविष्यवाणी। मैंने खुद इस प्रक्रिया को देखा है और यह अनुभव रोंगटे खड़े कर देने वाला होता है।

  1. घड़ों की स्थापना: पूजा से एक दिन पहले, पाहन तीन नए मिट्टी के घड़े (Pot) लेता है और उन्हें पवित्र जल से भर देता है। इन घड़ों को ‘सरना स्थल’ (पूजा का पवित्र स्थान) पर रखा जाता है।
  2. जल स्तर का निरीक्षण: अगले दिन सुबह, पाहन घड़ों के जल स्तर की जांच करता है।
    • यदि जल स्तर कम हो गया है, तो यह माना जाता है कि आने वाले साल में बारिश कम होगी या अकाल पड़ सकता है।
    • यदि जल स्तर समान रहता है, तो यह अच्छी और भरपूर बारिश का संकेत है।

यह विधि सदियों से किसानों को अपनी खेती की योजना बनाने में मदद करती आ रही है। इसे अंधविश्वास कहने के बजाय, इसे प्रकृति के सूक्ष्म संकेतों को पढ़ने की एक प्राचीन विद्या (Indigenous Knowledge System) माना जाना चाहिए।

सरना स्थल और केकड़ा पूजा

पूजा ‘सरना स्थल’ पर होती है, जो साल के पेड़ों का एक पवित्र समूह होता है। यहाँ किसी मूर्ति की पूजा नहीं होती, बल्कि अदृश्य शक्ति और प्रकृति की पूजा होती है। पाहन, साल के फूलों (सरई फूल) को देवताओं को अर्पित करता है।

इसके अलावा, केकड़े (Crab) को भी विशेष महत्व दिया जाता है। आदिवासी मान्यता के अनुसार, केकड़ा मिट्टी को चालकर (उलट-पुलट कर) उपजाऊ बनाता है, जो बुवाई के लिए शुभ है। इसलिए, केकड़े को पकड़कर पूजा स्थान पर लाया जाता है और उसे सम्मान दिया जाता है।

सामाजिक और सांस्कृतिक पहलू: नृत्य और उल्लास

सरहुल केवल पूजा तक सीमित नहीं है; यह सामाजिक समरसता का उत्सव है। पूजा समाप्त होने के बाद, पाहन गाँव के हर घर में जाता है और ‘सरई फूल’ देता है। लोग इस फूल को अपने कानों पर लगाते हैं या अपने घर के दरवाजों पर टांगते हैं। यह फूल उस घर के लिए सुख-शांति का प्रतीक माना जाता है।

इसके बाद शुरू होता है नृत्य और संगीत का दौर।

  • सरहुल नृत्य: पुरुष और महिलाएं एक दूसरे की कमर पकड़कर सामूहिक नृत्य करते हैं।
  • वाद्य यंत्र: मांदर (Mandar), ढोल और नगाड़े की थाप पर पूरा गाँव थिरकता है।
  • हड़िया (Handia): चावल से बना पारंपरिक पेय ‘हड़िया’ का सेवन प्रसाद के रूप में किया जाता है। इसे ‘तपन’ भी कहा जाता है, जो देवताओं को चढ़ाने के बाद समाज में बांटा जाता है।

इस दौरान जाति, ऊंच-नीच का भेद मिट जाता है। यह त्योहार समुदाय को एक सूत्र में पिरोने का काम करता है।

विभिन्न जनजातियों में सरहुल की विविधता

हालाँकि सरहुल की मूल भावना एक ही है, लेकिन अलग-अलग जनजातियों में इसे मनाने के तरीकों में सूक्ष्म अंतर देखने को मिलता है। एक शोधकर्ता के तौर पर, इन बारीकियों को समझना आवश्यक है:

  • उरांव (Oraon): वे इसे ‘खद्दी’ कहते हैं। उनके लिए यह ‘धर्मेश’ (सूर्य) और ‘धरती माता’ के विवाह का उत्सव है। उनकी पूजा में मुर्गे की बलि देने की प्रथा भी प्रचलित है, जिसमें अलग-अलग रंग के मुर्गे अलग-अलग देवताओं के लिए होते हैं।
  • मुंडा (Munda): वे इसे ‘बा-पोरब’ कहते हैं। मुंडा समुदाय में पूर्वजों की आत्माओं को विशेष रूप से याद किया जाता है और उन्हें साल के फूल अर्पित किए जाते हैं।
  • संथाल (Santhal): वे इसे ‘बाहा’ कहते हैं। उनकी पूजा विधि में जल और शुद्धिकरण पर बहुत जोर दिया जाता है। वे तब तक महुआ के फूल या नए पत्तों का उपयोग नहीं करते जब तक यह पूजा संपन्न न हो जाए।

सरहुल और आधुनिक प्रासंगिकता: पर्यावरण संरक्षण का संदेश

आज के दौर में जब हम “क्लाइमेट चेंज” और “ग्लोबल वार्मिंग” जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं, तब सरहुल क्या है, यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। सरहुल हमें सिखाता है कि प्रकृति ‘संसाधन’ (Resource) नहीं, बल्कि ‘सहोदर’ (Kin) है।

  1. पेड़ों का संरक्षण: सरहुल के कारण ही झारखंड के कई इलाकों में ‘सरना स्थल’ के रूप में जंगलों के बड़े हिस्से सुरक्षित हैं। इन पवित्र वनों (Sacred Groves) में कुल्हाड़ी चलाना वर्जित है। यह जैव विविधता (Biodiversity) को बचाने का एक प्राचीन और प्रभावी तरीका है।
  2. सतत जीवन शैली: यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि हमें प्रकृति से उतना ही लेना चाहिए जितनी आवश्यकता है। साल का वृक्ष हमें लकड़ी देता है, लेकिन हम उसे काटने के बजाय उसकी पूजा करते हैं—यह संतुलन का संदेश है।

आधुनिक समाज, जो कंक्रीट के जंगलों में खो गया है, उसे सरहुल से बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। यह पर्व हमें जड़ों की ओर लौटने और अपनी जीवनशैली में पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता लाने का आह्वान करता है।

निष्कर्ष

अंततः, सरहुल केवल एक आदिवासी त्योहार नहीं है; यह एक जीवन दर्शन है। यह हमें बताता है कि मानव का अस्तित्व प्रकृति की दया पर निर्भर है, न कि प्रकृति पर हमारी विजय पर। इतिहास की गहराइयों और लोककथाओं के माध्यम से हमने देखा कि कैसे साल का वृक्ष और धरती माता इस संस्कृति के केंद्र में हैं।

चाहे वह पाहन द्वारा बारिश की भविष्यवाणी हो, या कानों में सरई का फूल लगाकर मांदर की थाप पर नाचना, हर क्रिया के पीछे एक गहरा अर्थ छिपा है—कृतज्ञता, उल्लास और सह-अस्तित्व।

अगली बार जब आप वसंत ऋतु में साल के पेड़ों पर नए फूल खिलते देखें, तो याद रखें कि झारखंड के सुदूर गांवों में कोई मांदर बजाकर धरती और सूरज के मिलन का उत्सव मना रहा है। सरहुल हमें आमंत्रित करता है कि हम भी अपनी भागदौड़ भरी जिंदगी से कुछ पल निकालें और प्रकृति के इस अद्भुत संगीत को सुनें।

क्या आपने कभी सरहुल या किसी अन्य प्रकृति-आधारित पर्व का अनुभव किया है? अपने अनुभव हमें कमेंट्स में जरूर बताएं और इस धरोहर को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचाने में मदद करें।


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

  • सरहुल कब मनाया जाता है?
    यह चैत्र माह (मार्च-अप्रैल) के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है।
  • सरहुल में किस पेड़ की पूजा होती है?
    मुख्य रूप से साल (सखुआ) के वृक्ष की पूजा होती है।
  • सरहुल का मुख्य संदेश क्या है?
    प्रकृति प्रेम, संरक्षण और आपसी भाईचारा।

Written By:

Churka Hansda

Youtube: https://www.youtube.com/@santhalijharkhandculture

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