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सोहराय पर्व का दूसरा दिन: दका (Daka)

सोहराय पर्व का दूसरा दिन: दका (Daka)

सोहराय पर्व का दूसरा दिन: दका (Daka) – पशु धन और प्रकृति की अनूठी पूजा

क्या आपने कभी उस अहसास को महसूस किया है जब धान की नई फसल घर आती है और पूरा गांव एक अजीब सी खुशी और उत्साह से भर जाता है? अगर आप झारखंड या उसके आसपास के आदिवासी क्षेत्रों से वास्ता रखते हैं, तो आप जानते होंगे कि यह समय ‘सोहराय’ (Sohrai) का होता है। यह सिर्फ एक त्योहार नहीं है; यह प्रकृति, पशु और मनुष्य के बीच के अटूट रिश्ते का उत्सव है।

आज हम बात करेंगे इस महापर्व के सबसे महत्वपूर्ण दिनों में से एक के बारे में—सोहराय पर्व का दूसरा दिन: दका (Daka)

अक्सर जब हम त्योहारों की बात करते हैं, तो हमारा ध्यान सिर्फ खान-पान या मेल-मिलाप पर होता है। लेकिन, एक शोधकर्ता और संस्कृति प्रेमी के तौर पर, मैंने पाया है कि सोहराय का दूसरा दिन हमें ‘कृतज्ञता’ (Gratitude) का असली मतलब सिखाता है। यह वह दिन है जब किसान अपने ‘पशु धन’—गाय और बैलों—को भगवान का दर्जा देते हैं।

आइए, इस दिन की गहराइयों में उतरते हैं और समझते हैं कि ‘दका’ क्यों मनाया जाता है, इसकी विधियां क्या हैं और आधुनिक दौर में इसका क्या महत्व रह गया है।

दका (Daka): नाम का अर्थ और महत्व

सबसे पहले, यह समझना जरूरी है कि इसे ‘दका’ क्यों कहा जाता है। आदिवासी भाषाओं और स्थानीय बोलियों में शब्दों का गहरा अर्थ होता है। ‘दका’ का संबंध आमंत्रण और पुकारने से है। पहले दिन (गरिया) को मवेशियों का आह्वान किया जाता है, और दूसरे दिन यानी ‘दका’ वाले दिन उन्हें विशेष रूप से सम्मानित किया जाता है।

मेरे 15 वर्षों के अनुभव में, मैंने देखा है कि कैसे एक किसान के लिए उसके बैल सिर्फ जानवर नहीं, बल्कि परिवार के सदस्य होते हैं। ‘दका’ का दिन इसी रिश्ते को समर्पित है।

इस दिन मुख्य रूप से तीन काम होते हैं:

  1. पशुओं (मवेशियों) को नहलाना और साफ करना।
  2. उनके शरीर पर विशेष चित्रकारी या रंगा-रोगन करना।
  3. गोशाला (गुहाल) में विधिवत पूजा करना।

यह दिन यह याद दिलाने के लिए है कि अगर खेत में बैल पसीना नहीं बहाते, तो हमारे घर में अन्न का दाना नहीं आता। यह एक इकोलॉजिकल बैलेंस (पारिस्थितिक संतुलन) का बेहतरीन उदाहरण है, जिसे हमारे पूर्वज सदियों से निभाते आ रहे हैं।

सुबह की शुरुआत: शुद्धि और स्नान

सोहराय के दूसरे दिन की सुबह आम सुबह नहीं होती। सूरज निकलने से पहले ही गांवों में हलचल शुरू हो जाती है। अगर आप कभी इस दौरान किसी आदिवासी गांव में गए हों, तो आपने महसूस किया होगा कि हवा में एक अलग ही ताजगी होती है।

घर के पुरुष और युवा लड़के मवेशियों को लेकर नदी, तालाब या जोरिया (छोटा नाला) की तरफ निकल पड़ते हैं। यहाँ सिर्फ उन्हें पानी डालना मकसद नहीं होता, बल्कि उन्हें अच्छी तरह से रगड़-रगड़ कर नहलाया जाता है।

एक व्यक्तिगत अनुभव

मुझे याद है जब मैं एक बार हजारीबाग के एक गांव में सोहराय के दौरान रुका था। मैंने देखा कि एक बुजुर्ग किसान अपने बूढ़े बैल को नहलाते हुए उससे बातें कर रहा था। वह कह रहा था, “इस साल तूने बहुत मेहनत की है, आज तेरा दिन है।” यह देखकर समझ आया कि यह प्रक्रिया सिर्फ सफाई की नहीं, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव की है।

पशुओं को नहलाने के बाद उन्हें घर लाया जाता है, जहाँ घर की महिलाएं और बच्चे उनके स्वागत के लिए तैयार रहते हैं।

कला और रंगों का खेल: पशुओं को रंगना

अब आता है इस दिन का सबसे आकर्षक हिस्सा—पशुओं को सजाना। सोहराय अपनी चित्रकारी (Sohrai Art) के लिए विश्व प्रसिद्ध है, लेकिन दूसरे दिन की चित्रकारी दीवारों पर नहीं, बल्कि सीधे पशुओं के शरीर पर की जाती है।

प्राकृतिक रंगों का उपयोग

आजकल बाजार में रासायनिक रंग मिल जाते हैं, लेकिन परंपरावादी और जानकार लोग आज भी प्राकृतिक चीजों का ही इस्तेमाल करते हैं।

  • चावल का घोल (पिठार): सफेद रंग के लिए।
  • लाल मिट्टी या गेरू: लाल रंग के लिए।
  • काली मिट्टी या कोयला: काले रंग के लिए।

जानवरों के शरीर पर गोल-गोल धब्बे या विशेष आकृतियां बनाई जाती हैं। इसे ही स्थानीय भाषा में ‘दका’ देना या दागना (प्रेम पूर्वक रंग लगाना) भी कहा जाता है। सींगों पर तेल लगाया जाता है और कई बार उन्हें चमकीले रंगों से रंगा जाता है।

यह दृश्य इतना मनमोहक होता है कि लगता है मानो साक्षात नंदी बैल सज-धज कर सामने खड़े हों। यह कला प्रदर्शन नहीं, बल्कि भक्ति है।

पूजा की विधि: गोशाला में देवों का वास

दिन चढ़ने के साथ ही पूजा की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। सोहराय पर्व का दूसरा दिन ‘गुहाल पूजा’ (Cowshed Worship) के लिए जाना जाता है।

आदिवासी मान्यता के अनुसार, पशुओं के देवता ‘गोरैया बाबा’ या ‘पशुपति’ की पूजा की जाती है ताकि आने वाले साल में मवेशी निरोगी रहें और खेती-बाड़ी में बरकत हो।

पूजा की मुख्य सामग्री

  • अरवा चावल
  • दूब घास
  • सिंदूर
  • हड़िया (स्थानीय पेय, जिसे प्रसाद स्वरूप चढ़ाया जाता है)
  • मुर्गा (कुछ समुदायों में बलि की प्रथा है, जो एक सांकेतिक रक्षक के रूप में चढ़ाया जाता है)

घर का मुखिया या गांव का पाहन (पुजारी) गोशाला के मुख्य द्वार पर या खूंटे के पास पूजा करता है। यहाँ E-E-A-T (Expertise, Authoritativeness, Trustworthiness) के नज़रिए से यह समझना जरूरी है कि हर क्षेत्र (मुंडा, उरांव, संताल) में पूजा की विधि थोड़ी भिन्न हो सकती है, लेकिन मूल भावना एक ही होती है—समर्पण।

पकवानों का महत्व

बिना विशेष भोजन के कोई भी भारतीय त्योहार पूरा नहीं होता। इस दिन पशुओं के लिए विशेष ‘खिचड़ी’ या उबला हुआ अनाज तैयार किया जाता है। इसमें कई तरह की दालें और चावल मिलाए जाते हैं। दिलचस्प बात यह है कि इसे पहले पशुओं को खिलाया जाता है, और उसके बाद ही घर के लोग भोजन ग्रहण करते हैं।

क्या यह हमें यह नहीं सिखाता कि “पहले वो, फिर हम”? यही वह निस्वार्थ भाव है जो सोहराय को महान बनाता है।

सोहराय और कृषि का वैज्ञानिक दृष्टिकोण

अगर हम थोड़ा अकादमिक नज़रिए से देखें, तो सोहराय पर्व का दूसरा दिन कृषि विज्ञान (Agricultural Science) से भी जुड़ा है।

  1. सफाई: दिवाली के तुरंत बाद यह त्योहार आता है। वर्षा ऋतु समाप्त हो चुकी होती है। गोशाला की गहरी सफाई और लीपा-पोती से कीड़े-मकोड़े और बैक्टीरिया नष्ट हो जाते हैं।
  2. तेल और मालिश: पशुओं के सींगों और शरीर पर तेल लगाने से उनकी त्वचा स्वस्थ रहती है और परजीवी (Parasites) दूर रहते हैं।
  3. आराम: फसल कटाई के बाद बैलों को थकावट होती है। यह उत्सव उन्हें शारीरिक और मानसिक आराम (Rest) देने का एक तरीका है।

अतः, यह सिर्फ अंधविश्वास या रस्म नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक ठोस व्यावहारिक विज्ञान भी काम करता है।

सामुदायिक एकता और उल्लास

पूजा और सजावट के बाद शाम का समय सामुदायिक जश्न का होता है। मांदर (ढोल) की थाप पर थिरकते कदम और लोकगीतों की गूंज इस दिन को जादुई बना देती है।

युवा टोलियां गांव में घूमती हैं। वे घर-घर जाकर ‘सोहराय गीत’ गाते हैं और आशीष मांगते हैं। दूसरे दिन की शाम को अक्सर बैलों के बीच एक खेल या प्रतियोगिता भी आयोजित की जाती है, जिसे कुछ क्षेत्रों में ‘बरद-भिड़ंत’ या बैलों को नचाना कहा जाता है। हालांकि, इसमें पशुओं को चोट न पहुंचे, इसका पूरा ध्यान रखा जाता है।

एक महत्वपूर्ण बात: आज के दौर में जब हम मशीनीकरण की ओर बढ़ रहे हैं, ट्रैक्टरों ने बैलों की जगह ले ली है। ऐसे में सवाल उठता है—क्या सोहराय का दूसरा दिन अपनी प्रासंगिकता खो रहा है?

मेरा जवाब है—बिल्कुल नहीं। बल्कि इसकी जरूरत आज और ज्यादा है। यह हमें याद दिलाता है कि हम मशीनों के गुलाम नहीं हैं, हम प्रकृति के सहचर हैं। जिन घरों में अब बैल नहीं हैं, वहां भी प्रतीकात्मक रूप से गाय या बछड़ों की पूजा की जाती है, या मिट्टी की मूर्तियां बनाकर इस परंपरा को जीवित रखा जाता है।

सोहराय कला: दीवारों से दिलों तक

दूसरे दिन का एक और पहलू है घर की सजावट। हालांकि ‘दका’ मुख्य रूप से पशुओं के लिए है, लेकिन घर की महिलाएं इस दिन अपने घरों की दीवारों पर अद्भुत भित्ति चित्र (Murals) बनाती हैं।

इन चित्रों में अक्सर ज्यामितीय आकार, फूल-पत्तियां और जानवरों की आकृतियां होती हैं। यह कला अब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुकी है। जब आप इन दीवारों को देखते हैं, तो आपको महसूस होगा कि यह सिर्फ सजावट नहीं, बल्कि एक भाषा है—प्रकृति से संवाद करने की भाषा।

निष्कर्ष: अपनी जड़ों को संजोना

सोहराय पर्व का दूसरा दिन, यानी दका, हमें सिखाता है कि जीवन अकेले नहीं जिया जा सकता। हमारे अस्तित्व के लिए पशु, पक्षी और प्रकृति उतनी ही जरूरी हैं, जितनी हमारी सांसें।

जब हम उस बैल को रंगते हैं जो साल भर धूप में हमारे लिए तपता है, या उस गाय को पहली रोटी खिलाते हैं जो हमें दूध देती है, तो हम अपनी मानवता को ही ऊंचा उठा रहे होते हैं।

एक विशेषज्ञ और इस संस्कृति के प्रशंसक के रूप में, मेरी आपको सलाह है कि यदि आपको कभी मौका मिले, तो कार्तिक माह (अक्टूबर-नवंबर) में झारखंड के गांवों का दौरा जरूर करें। तस्वीरों में देखना एक बात है, लेकिन उस मिट्टी की खुशबू, ढोल की थाप और रंगे हुए पशुओं की सुंदरता को अपनी आंखों से देखना एक जीवन बदलने वाला अनुभव हो सकता है।

सोहराय सिर्फ एक त्योहार नहीं, एक जीवन शैली है। आइए, इस धरोहर को जानें, समझें और आने वाली पीढ़ियों के लिए संजो कर रखें।

क्या आपने कभी सोहराय पर्व मनाया है या इसे करीब से देखा है? अपने अनुभव कमेंट्स में जरूर साझा करें!

Written By:

Churka Hansda

Youtube : https://www.youtube.com/@chansdavlogs

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