सोहराय पर्व: खूँटाव (Khuntaw) – परम्परा, रोमांच और पशुधन की अनूठी पूजा
जब आप झारखंड, पश्चिम बंगाल या ओडिशा के आदिवासी क्षेत्रों में ढोल और मांदर की गूंज सुनते हैं, और हवा में धुले हुए चावल और गुड़ की भीनी खुशबू तैरने लगती है, तो समझ जाइये कि प्रकृति और पशु-प्रेम का सबसे बड़ा त्यौहार ‘सोहराय’ आ गया है। लेकिन, इस पांच दिवसीय उत्सव का असली रोमांच और ऊर्जा जिस दिन देखने को मिलती है, वह है सोहराय पर्व का तीसरा दिन: खूँटाव (Khuntaw)।
एक शोधकर्ता और भारतीय जनजातीय संस्कृति के गहरे अध्ययनकर्ता के रूप में, मैंने कई बार इन गांवों की धूल भरी पगडंडियों पर बैठकर इस त्यौहार को करीब से देखा है। यह केवल एक उत्सव नहीं है; यह मनुष्य और जानवर के बीच के उस आदिम रिश्ते का सम्मान है, जिसने मानव सभ्यता को खेती करना सिखाया। आज के इस विस्तृत लेख में, हम खूँटाव के हर पहलू—इसके अनुष्ठान, इसके रोमांच और इसके सामाजिक-वैज्ञानिक महत्व—का विश्लेषण करेंगे।
सोहराय: पशुओं के प्रति कृतज्ञता का महापर्व
इससे पहले कि हम खूँटाव की गहराई में उतरें, यह समझना आवश्यक है कि सोहराय आखिर है क्या। दिवाली के समय जब पूरा देश दीयों की रोशनी में नहाया होता है, तब आदिवासी समुदाय (विशेषकर संथाल, मुंडा और उरांव) अपनी आजीविका के मुख्य आधार—अपने पशुओं (गाय, बैल, भैंस)—की पूजा कर रहे होते हैं।
कृषि प्रधान समाज में बैल केवल जानवर नहीं, बल्कि परिवार का सदस्य और खेती का साझीदार होता है। सोहराय मूल रूप से फसल कटने की खुशी और पशुओं को ‘धन्यवाद’ देने का त्यौहार है।
खूँटाव (Khuntaw) का अर्थ और महत्व
सोहराय के पहले दो दिन (उम और दका) देवताओं के आह्वान और घर की शुद्धि में बीतते हैं। लेकिन तीसरा दिन, जिसे ‘खूँटाव’ कहा जाता है, पूरी तरह से पौरुष, शक्ति प्रदर्शन और मनोरंजन को समर्पित है।
‘खूँटाव’ शब्द का अर्थ है—खूंटे से बांधना। इस दिन बैलों को विशेष रूप से तैयार किए गए मजबूत लकड़ी के खूंटों से बांधा जाता है और उन्हें ‘खेलाया’ या ‘नचाया’ जाता है। यह दिन दो मुख्य कारणों से महत्वपूर्ण है:
- पशु की शक्ति का सम्मान: यह बैलों की शारीरिक क्षमता और तेज को परखने का दिन है।
- मनुष्य का साहस: यह युवाओं के लिए अपने साहस और कौशल को प्रदर्शित करने का भी अवसर होता है।
खूँटाव की सुबह: तैयारी और श्रृंगार
सुबह के सूरज की पहली किरण के साथ ही शुरू हो जाती है। मेरे अनुभव में, इस दिन की शुरुआत एक अजीब सी शांति और पवित्रता के साथ होती है, जो दोपहर होते-होते चरम उत्साह में बदल जाती है।
1. गोहाल (Gora) की सफाई
सबसे पहले पशुशाला या ‘गोहाल’ की अच्छी तरह से सफाई की जाती है। यह केवल झाड़ू लगाने जैसा नहीं है; यह उस स्थान को मंदिर जैसा पवित्र बनाने की प्रक्रिया है जहाँ ‘लक्ष्मी’ (पशुधन) निवास करती है।
2. बैलों का राजसी श्रृंगार
खूँटाव के लिए चुने गए बैलों को नहला-धुलाकर तैयार किया जाता है। उनके सींगों पर तेल (महुआ या सरसों) और सिंदूर लगाया जाता है। कई जगहों पर सींगों को रंगा भी जाता है। मैंने देखा है कि कैसे किसान अपने बैलों के माथे पर प्यार से हाथ फेरते हैं, जैसे कोई पिता अपने बच्चे को तैयार कर रहा हो।
- धान की बालियों का मुकुट: बैलों के गले में धान की बालियों से बनी मालाएं और महुआ के फूलों की मालाएं पहनाई जाती हैं। यह दर्शाता है कि वे ही इस फसल के असली हकदार हैं।
खूंटा गाड़ना: एक तकनीकी और पारंपरिक प्रक्रिया
खूँटाव का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है—सही खूंटे (Post) का चुनाव और स्थापना। यह किसी भी लकड़ी का नहीं हो सकता।
परंपरागत रूप से, इसके लिए ‘सखुआ’ (Sal) या ‘महुआ’ की लकड़ी का उपयोग किया जाता है। इसका वैज्ञानिक कारण यह है कि ये लकड़ियां बेहद मजबूत होती हैं और उत्तेजित बैल के खिंचाव को झेल सकती हैं।
गाँव के बीचों-बीच, जिसे अक्सर ‘कुल्ही’ (गाँव की मुख्य सड़क) कहा जाता है, वहां हर परिवार अपने घर के सामने खूंटा गाड़ता है। खूंटे को भी सिंदूर और अरवा चावल के लेप से पूजा जाता है। यह खूंटा केवल लकड़ी का टुकड़ा नहीं, बल्कि उस दिन के लिए शक्ति का केंद्र बिंदु (Center of Energy) बन जाता है।
मुख्य आयोजन: जब मांदर की थाप पर थिरकते हैं बैल
दोपहर ढलते ही असली रोमांच शुरू होता है। यही वह समय है जब सोहराय पर्व का तीसरा दिन: खूँटाव अपने पूरे शबाब पर होता है।
अनुष्ठान का स्वरूप
बैलों को घर से बाहर लाकर खूंटे से बांधा जाता है। रस्सी (जिसे ‘पाघा’ कहा जाता है) इतनी लंबी रखी जाती है कि बैल गोल-गोल घूम सके, लेकिन इतनी छोटी भी कि वह नियंत्रण से बाहर न जाए।
बैलों को ‘खेलाना’ (Teasing the Bull)
गाँव के युवक, हाथों में सूखी चमड़ी या विशेष प्रकार की चटाई लेकर बैलों के सामने आते हैं। वे बैलों को उकसाते हैं। ढोल, नगाड़े और मांदर की तेज आवाज बैलों को उत्तेजित करती है।
यहाँ एक बहुत ही सूक्ष्म बात समझने की जरूरत है, जिसे अक्सर बाहरी लोग गलत समझ लेते हैं। यह स्पेन की ‘बुल फाइटिंग’ (Bullfighting) नहीं है जहाँ जानवर को चोट पहुंचाई जाती है। यहाँ उद्देश्य बैल को मारना या घायल करना नहीं है।
- उद्देश्य: उद्देश्य है बैल के अंदर की ‘जीवनी शक्ति’ (Vitality) को जगाना। जब बैल हुंकार भरता है, मिट्टी को खुरों से उड़ाता है और सींग चलाता है, तो आदिवासी किसान खुश होता है। यह इस बात का संकेत है कि उसका बैल स्वस्थ है और अगली खेती के लिए तैयार है।
लोकगीत और संगीत (Sohrai Sereng)
खूँटाव के दौरान गाए जाने वाले गीत (सोहराय सेरेंग) अद्भुत होते हैं। ये गीत अक्सर बैलों की सुंदरता, उनकी ताकत और परिवार में उनके योगदान का वर्णन करते हैं।
“हो… रे… हियो… रे…”
इन ध्वनियों के साथ जब पूरा गाँव गूंजता है, तो एक सामूहिक ऊर्जा का संचार होता है। स्त्रियाँ दूर खड़ी होकर यह दृश्य देखती हैं और गीत गाती हैं, जबकि पुरुष मैदान में अपने कौशल का प्रदर्शन करते हैं।

सुरक्षा और नैतिकता: एक संतुलित दृष्टिकोण
पशु अधिकार कार्यकर्ता इस प्रथा पर सवाल उठाते हैं। लेकिन जमीनी हकीकत को सांस्कृतिक संदर्भ में देखना जरूरी है।
- पशु क्रूरता नहीं, पूजा है: खूँटाव के दौरान बैलों को चोट न लगे, इसका पूरा ध्यान रखा जाता है। यह खेल कुछ ही समय के लिए होता है।
- विशेष भोजन: खेल खत्म होने के बाद, बैलों के पैर धोए जाते हैं और उन्हें विशेष रूप से तैयार किए गए चावल के पीठा (Pitha) खिलाए जाते हैं। यह सम्मान किसी भी अन्य दिन से ज्यादा होता है।
- सामुदायिक बंधन: यह त्यौहार इंसानों और जानवरों के बीच के डर को खत्म करता है और एक गहरा भावनात्मक बंधन बनाता है।
खूँटाव का समाजशास्त्रीय विश्लेषण
सोहराय का यह तीसरा दिन आदिवासी समाज की संरचना के बारे में बहुत कुछ कहता है।
1. कृषि का उत्सव
खूँटाव सीधे तौर पर कृषि अर्थव्यवस्था से जुड़ा है। एक सुस्त बैल किसान के लिए अभिशाप है, जबकि एक फुर्तीला और गुस्सैल बैल (जो खूँटाव में अच्छा प्रदर्शन करे) गर्व का विषय है। यह एक तरह का ‘फिटनेस टेस्ट’ है।
2. युवाओं का दीक्षांत समारोह
अप्रत्यक्ष रूप से, यह गाँव के युवाओं के लिए भी परीक्षा की घड़ी होती है। जो युवक निडर होकर उफनते हुए बैल के सामने खड़ा होता है, उसे समाज में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। यह उनके धैर्य, चपलता और साहस का प्रमाण होता है।
3. समानता का प्रतीक
इस दिन अमीर और गरीब का भेद मिट जाता है। चाहे किसी के पास दस बैल हों या एक, खूँटाव में सभी एक ही पंक्ति में, एक ही सड़क पर अपने पशुओं को बांधते हैं। सामुदायिक भावना का इससे बेहतरीन उदाहरण मिलना मुश्किल है।
आधुनिकता के दौर में खूँटाव
बीते 15 वर्षों में मैंने देखा है कि कैसे आधुनिकता ने इस पर्व को प्रभावित किया है। जहाँ एक ओर डीजे (DJ) और आधुनिक बाजे गाँव में प्रवेश कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर खूँटाव की मूल आत्मा अभी भी जीवित है।
आजकल कई जगहों पर खूँटाव को एक प्रतियोगिता का रूप दे दिया गया है, जहाँ सबसे अच्छे प्रदर्शन करने वाले बैल और उसके मालिक को पुरस्कृत किया जाता है। यह बदलाव सकारात्मक है क्योंकि इससे नई पीढ़ी की रुचि अपनी संस्कृति में बनी रहती है। हालाँकि, हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रतियोगिता के चक्कर में ‘पूजा’ का भाव ‘प्रदर्शन’ में न बदल जाए।
निष्कर्ष: माटी की गंध और संस्कृति की धरोहर
सोहराय पर्व का तीसरा दिन: खूँटाव केवल मनोरंजन का साधन नहीं है। यह एक जीवित दस्तावेज है जो बताता है कि आदिवासी समाज प्रकृति के कितना करीब है। जहाँ शहरी दुनिया में हम अपने भोजन के स्रोत (खेती और पशु) से कट चुके हैं, वहाँ खूँटाव हमें याद दिलाता है कि हमारा अस्तित्व इन मूक प्राणियों के श्रम पर टिका है।
खूँटाव की धूल, मांदर की थाप और बैलों की हुंकार में जो संगीत है, वह किसी भी आधुनिक संगीत से ज्यादा रूहानी है। यदि आपने कभी इस दृश्य को अपनी आँखों से नहीं देखा है, तो अगली सोहराय में झारखंड की यात्रा अवश्य करें। यह अनुभव आपको जीवन और प्रकृति के प्रति एक नया नजरिया देगा।
हमारा कर्तव्य है कि हम ऐसी समृद्ध परंपराओं का दस्तावेजीकरण करें और उन्हें सम्मान दें, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ यह जान सकें कि असली भारत की आत्मा उसके गाँवों और उसके लोक-पर्वों में बसती है।
क्या आपने कभी सोहराय या खूँटाव का अनुभव किया है? अपने अनुभव या सवाल नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें। आपकी कहानियाँ हमारी संस्कृति को जीवित रखने में मदद करती हैं।
