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सोहराय पर्व के चौथा दिन : जाले (Jale)

सोहराय पर्व के चौथा दिन

सोहराय पर्व के चौथा दिन : जाले (Jale) – आदिवासियों की अनोखी लोक परंपरा और सामूहिकता का प्रतीक

जब हम भारतीय लोक परंपराओं की गहराई में उतरते हैं, तो हमें एहसास होता है कि हमारे आदिवासी समाज ने प्रकृति और आपसी भाईचारे को कितने सुंदर ढंग से संजोकर रखा है। अगर आप झारखंड, बंगाल या ओडिशा के ग्रामीण इलाकों से वाकिफ हैं, तो ‘सोहराय’ शब्द सुनते ही आपके कानों में मांदर की थाप और हवा में नई फसल की खुशबू तैरने लगती होगी। आज हम इस महापर्व के एक बहुत ही विशिष्ट और रोमांचक हिस्से पर बात करेंगे—सोहराय पर्व के चौथा दिन : जाले (Jale)।

यह दिन केवल एक रस्म नहीं है; यह समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और उल्लास का एक अद्भुत संगम है। एक शोधकर्ता और संस्कृति प्रेमी के तौर पर, मैंने कई बार इन उत्सवों को करीब से देखा है, और हर बार मुझे इसमें कुछ नया सीखने को मिला है। आइए, इस दिन की गहराई को समझते हैं।

सोहराय: प्रकृति और पशुधन का उत्सव

इससे पहले कि हम चौथे दिन की विशिष्टताओं में गोता लगाएँ, यह समझना जरूरी है कि सोहराय आखिर है क्या? यह दीपावली के तुरंत बाद मनाया जाने वाला एक प्रमुख आदिवासी त्योहार है, जो मुख्य रूप से संथाल, मुंडा और उरांव जनजातियों द्वारा मनाया जाता है। यह पर्व 5 दिनों तक चलता है और मूल रूप से यह पशुधन (गायों और बैलों) के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और नई फसल के स्वागत का त्योहार है।

लेकिन, सोहराय पर्व के चौथा दिन : जाले का अपना ही एक अलग रंग है। जहाँ पहले तीन दिन पूजा-पाठ और पशुओं के सम्मान में बीतते हैं, वहीं चौथा दिन पूरी तरह से सामाजिक मेल-मिलाप और युवाओं के उत्साह को समर्पित होता है।

जाले (Jale) का अर्थ और महत्व

‘जाले’ शब्द का स्थानीय संदर्भ में अर्थ होता है—घूमना-फिरना या एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना। इस दिन का मुख्य उद्देश्य गाँव के लोगों के बीच आपसी प्रेम और सौहार्द को बढ़ाना है।

शोध की दृष्टि से देखें तो, ‘जाले’ एक बेहतरीन ‘कम्युनिटी बिल्डिंग एक्सरसाइज’ (Community Building Exercise) है। आज के आधुनिक दौर में जहाँ हम पड़ोसी को भी नहीं जानते, वहीं सोहराय के इस चौथे दिन पूरा गाँव एक परिवार बन जाता है। इस दिन किसी के घर का दरवाजा बंद नहीं होता और न ही कोई पराया होता है।

दिन की शुरुआत: उल्लास और तैयारी

चौथे दिन की सुबह बाकी दिनों से थोड़ी अलग होती है। गाँव के अखाड़े में एक अलग ही चहल-पहल होती है। यह दिन विशेष रूप से युवाओं का होता है। गाँव के युवक और युवतियाँ अपनी पारंपरिक वेशभूषा में सज-धज कर तैयार होते हैं।

मेरे एक क्षेत्रीय दौरे के दौरान, मैंने देखा कि कैसे युवा अपने वाद्य यंत्रों—मांदर, नगाड़ा और बांसुरी—की ट्यूनिंग करते हैं। उनकी आँखों में एक चमक होती है, क्योंकि आज उन्हें पूरे गाँव का भ्रमण करना होता है।

युवा टोलियाँ और घर-घर जाने की परंपरा

सोहराय पर्व के चौथा दिन : जाले का सबसे आकर्षक दृश्य वह होता है जब युवा टोलियाँ बनाकर घर-घर जाते हैं। इसे केवल ‘भीख मांगना’ या ‘चंदा इकट्ठा करना’ समझना बहुत बड़ी भूल होगी। यह एक सांस्कृतिक अनुष्ठान है।

1. टोलियों का गठन

गाँव के युवा (लड़के और लड़कियाँ दोनों, कई बार अलग-अलग समूहों में और कई बार साथ में) एक समूह बनाते हैं। इस समूह का एक नेतृत्वकर्ता होता है जो गीतों की शुरुआत करता है।

2. पारंपरिक गीत और नृत्य

जब यह टोली किसी गृहस्थ के आंगन में पहुँचती है, तो वे सीधे अनाज नहीं मांगते। वे पहले उस घर की सुख-शांति के लिए गीत गाते हैं। इन गीतों को ‘सोहराय गीत’ कहा जाता है। इन गीतों में प्रकृति की प्रशंसा, घर के मालिकों को आशीर्वाद और पशुधन की वृद्धि की कामना होती है।

एक प्रचलित लोकगीत का भाव कुछ इस तरह होता है:
“हे गृहस्वामी, आपके कोठे (भंडार) में धान भरा रहे, आपकी गायें दूध देती रहें, हम आपके द्वार पर आए हैं, हमें खाली हाथ न जाने दें।”

जैसे ही ढोल और मांदर की थाप गूंजती है, घर के लोग बाहर निकल आते हैं। स्त्रियाँ इन युवाओं के पैर धोती हैं या उनका तिलक लगाकर स्वागत करती हैं। यह दृश्य इतना भावुक और अपनापन लिए होता है कि इसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है।

3. अनाज इकट्ठा करना (The Collection of Grain)

नाच-गाने के बाद, टोली गृहस्वामी से ‘नेग’ (उपहार) मांगती है। परंपरानुसार, लोग उन्हें चावल, दाल, सब्जियाँ, और कभी-कभी थोड़ा पैसा भी देते हैं। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि कोई भी अपनी क्षमता से अधिक देने के लिए बाध्य नहीं होता, और न ही कोई कम मिलने पर बुरा मानता है।

मैंने देखा है कि एक गरीब किसान भी अपनी मुट्ठी भर चावल बड़े गर्व से इन युवाओं की झोली में डालता है। यह अनाज केवल भोजन नहीं है; यह उस किसान का समाज के प्रति योगदान है।

जाले के पीछे का सामाजिक और आर्थिक विज्ञान

एक अकादमिक दृष्टिकोण से, सोहराय पर्व के चौथा दिन : जाले की यह प्रथा एक बेहतरीन आर्थिक मॉडल पेश करती है। इसे हम ‘संसाधनों का पुनर्वितरण’ (Redistribution of Resources) कह सकते हैं।

  • समानता का भाव: जब युवा घर-घर जाते हैं, तो वे अमीर और गरीब का भेद नहीं करते। वे गाँव के जमींदार के घर भी जाते हैं और एक साधारण मजदूर के घर भी। इससे समाज में समानता का भाव बना रहता है।
  • सामूहिक भोज (वनभोज): इकट्ठा किया गया अनाज किसी एक व्यक्ति का नहीं होता। शाम को या अगले दिन, इस सारे अनाज को मिलाकर एक विशाल सामुदायिक भोज (Community Feast) का आयोजन किया जाता है। जिसे अक्सर ‘खिचड़ी’ या स्थानीय व्यंजनों के रूप में पकाया जाता है। इस भोज में पूरा गाँव साथ बैठकर खाता है। सोचिए, जिस चावल को अलग-अलग घरों से लाया गया था, वह एक ही बर्तन में पककर एक हो जाता है—यह एकता का कितना सशक्त उदाहरण है!

सांस्कृतिक एथिक्स और अनुशासन

इस परंपरा में अनुशासन का बहुत महत्व है। भले ही माहौल उत्सव का हो, लेकिन मर्यादा कभी नहीं लांघी जाती।

  • बड़ों का सम्मान: युवा टोलियाँ जब भी किसी बुजुर्ग के घर जाती हैं, तो पहले उनके पैर छूकर आशीर्वाद लेती हैं।
  • नशा-पान से संयम: हालाँकि सोहराय में हड़िया (स्थानीय पेय) का प्रचलन है, लेकिन जाले के दौरान घर-घर जाते समय युवा अक्सर अनुशासन में रहते हैं ताकि वे हर घर में सम्मानपूर्वक प्रस्तुति दे सकें।

एक बार मैंने एक बुजुर्ग आदिवासी से पूछा कि क्या उन्हें बुरा नहीं लगता जब युवा शोर मचाते हुए आते हैं? उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “अरे बाबू, यह शोर नहीं है। यह तो जीवन है। जिस साल यह शोर नहीं होगा, समझो हमारा गाँव बूढ़ा हो गया।” यह अनुभव मुझे सिखा गया कि परंपराएं केवल नियम नहीं, बल्कि समाज की धड़कन होती हैं।

आधुनिकता के दौर में ‘जाले’ का बदलता स्वरूप

आज जब हम सोहराय पर्व के चौथा दिन : जाले की बात करते हैं, तो हमें यथार्थवादी भी होना चाहिए। वैश्वीकरण और शहरीकरण का असर इस परंपरा पर भी पड़ा है।

  1. पलायन का प्रभाव: शिक्षा और रोजगार के लिए बहुत से युवा गाँवों से शहरों की ओर पलायन कर गए हैं। इससे टोलियों की संख्या में कमी आई है। कई बार गाँवों में केवल बच्चे या बुजुर्ग ही बचते हैं, जिससे वह ऊर्जा थोड़ी कम महसूस होती है जो पहले हुआ करती थी।
  2. तकनीक का दखल: अब कई जगहों पर पारंपरिक वाद्य यंत्रों की जगह डीजे (DJ) या रिकॉर्डेड गानों ने ले ली है। हालाँकि, शोधकर्ता इसे ‘संस्कृति का ह्रास’ नहीं बल्कि ‘संस्कृति का विकास’ मानते हैं, लेकिन मांदर की असली थाप का जो जादू है, वह इलेक्ट्रॉनिक बीट्स में कहाँ?
  3. बदलती मानसिकता: नई पीढ़ी के कुछ बच्चे घर-घर जाकर अनाज मांगने में संकोच महसूस करते हैं। हमें उन्हें यह समझाने की जरूरत है कि यह मांगना नहीं, बल्कि सामाजिक सहभागिता है।

सोहराय और अन्य भारतीय फसल उत्सव: एक तुलनात्मक अध्ययन

अगर हम सोहराय के ‘जाले’ की तुलना भारत के अन्य त्योहारों से करें, तो हमें कई समानताएँ मिलती हैं।

  • लोहड़ी (पंजाब): लोहड़ी में भी बच्चे घर-घर जाकर ‘सुंदर मुंदरिए’ गाते हैं और लोहड़ी मांगते हैं।
  • छेरछेरा (छत्तीसगढ़): छत्तीसगढ़ के इस पर्व में भी लोग ‘छेरछेरा, माई कोठी के धान ला हेर हेरा’ कहते हुए अनाज मांगते हैं।

यह दर्शाता है कि भारत की आत्मा एक ही है, बस उसके रूप अलग-अलग हैं। हर जगह फसल कटने के बाद खुशी बांटने और संसाधनों को साझा करने की परंपरा रही है। सोहराय का जाले दिन इसी महान भारतीय परंपरा का एक आदिवासी संस्करण है जो प्रकृति के अधिक करीब है।

जाले के दौरान गाए जाने वाले गीतों का सौंदर्य

इस दिन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा ‘जाले गीत’ होते हैं। ये गीत लिखित नहीं होते, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से हस्तांतरित होते हैं। इन गीतों में हास्य भी होता है और व्यंग्य भी।

उदाहरण के लिए, युवा अक्सर मजाक में गाते हैं कि “अगर आप जल्दी अनाज नहीं देंगे, तो हम आपकी दीवार की पेंटिंग (सोहराय कला) अपने साथ ले जाएंगे।” यह निर्दोष हास्य माहौल को हल्का और आनंदमय बना देता है।

निष्कर्ष: परंपरा को जीवित रखने का संकल्प

सोहराय पर्व के चौथा दिन : जाले (Jale) केवल नाच-गाने का दिन नहीं है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। यह हमें सिखाता है कि खुशियाँ बांटने से बढ़ती हैं और अनाज मिल-बांटकर खाने से उसका स्वाद दोगुना हो जाता है।

आज जब हम अपनी स्क्रीन और गैजेट्स में सिमटते जा रहे हैं, ‘जाले’ जैसी परंपराएं हमें वापस अपनी जड़ों की ओर बुलाती हैं। युवा टोलियों का वह उत्साह, मांदर की वह गूंज, और अनाज का वह पवित्र दान—यह सब मिलकर एक ऐसे समाज का निर्माण करते हैं जहाँ कोई अकेला नहीं है।

अगर आपको कभी मौका मिले, तो कार्तिक महीने (अक्टूबर-नवंबर) में झारखंड के किसी गाँव में सोहराय के दौरान जरूर जाएँ। चौथे दिन उन टोलियों के साथ चलें, उस धूल, उस संगीत और उस प्रेम को महसूस करें। मेरा विश्वास मानिए, यह अनुभव आपके जीवन के सबसे समृद्ध अनुभवों में से एक होगा।

आइए, हम अपनी इन लोक परंपराओं का सम्मान करें, इनका दस्तावेजीकरण करें और आने वाली पीढ़ियों को गर्व के साथ सौंपें। क्योंकि जब तक ‘जाले’ है, तब तक गाँव में जीवन है, और जब तक गाँव जीवित है, तब तक हमारी संस्कृति जीवित है।

क्या आपने कभी सोहराय पर्व मनाया है या ऐसी किसी लोक परंपरा का हिस्सा बने हैं? अपने अनुभव कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें!

Written By:

Churka Hansda

Youtube : https://www.youtube.com/@chansdavlogs

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