भगवा आतंकवाद: कब पहली बार सामने आया ये शब्द और कैसे बना राजनीति का हथियार?
नई दिल्ली – 2008 का मालेगांव विस्फोट और फिर उसके बाद सामने आए ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द ने भारतीय राजनीति, मीडिया और समाज में एक बड़ा भूचाल ला दिया था। अब, 31 जुलाई 2025 को एनआईए कोर्ट द्वारा सभी आरोपियों को साबित सबूतों के अभाव में बरी कर दिए जाने के बाद, यह शब्द फिर से सुर्खियों में है। लेकिन सवाल यह है – ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द सबसे पहले किसने इस्तेमाल किया था? और कैसे यह एक राजनीतिक हथियार बन गया?
आइए जानते हैं इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि और इसके गहरे निहितार्थ।
मालेगांव विस्फोट और जांच की दिशा
29 सितंबर 2008, महाराष्ट्र के मालेगांव में बम विस्फोट हुआ, जिसमें 6 लोगों की मौत और 100 से ज्यादा लोग घायल हुए। प्रारंभिक जांच इस्लामिक संगठनों की ओर इशारा कर रही थी, लेकिन फिर एक मोड़ तब आया जब बम से जुड़ी मोटरसाइकिल साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के नाम पर रजिस्टर्ड निकली।
इसके बाद महाराष्ट्र एटीएस ने लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत पुरोहित, सुधाकर चतुर्वेदी, सुधाकर द्विवेदी, साध्वी प्रज्ञा और अन्य को गिरफ्तार किया और दावा किया कि वे हिंदू राष्ट्रवादी संगठन ‘अभिनव भारत’ से जुड़े हैं।
कब और किसने कहा ‘भगवा आतंकवाद’?
इस घटनाक्रम के बाद ही ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द पहली बार चर्चा में आया।
कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने अगस्त 2010 में डीजीपी-आईजी कॉन्फ्रेंस में यह शब्द उपयोग में लिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि अब आतंकवाद की जांच केवल इस्लामिक संगठनों तक सीमित नहीं, बल्कि हिंदू अतिवादी संगठनों की ओर भी जा रही है।
बाद में, दिग्विजय सिंह और शरद पवार ने भी इस शब्द का उल्लेख किया। पवार ने तो यहां तक कहा कि यह शब्द सबसे पहले उन्हीं के द्वारा प्रयोग किया गया था।

भगवा आतंकवाद: एक राजनीतिक हथियार
विपक्षी दलों खासकर कांग्रेस ने इस शब्द का इस्तेमाल कर भाजपा और आरएसएस जैसे संगठनों पर निशाना साधा, लेकिन इस शब्द को लेकर जबरदस्त राजनीतिक विवाद हुआ।
भाजपा और संघ परिवार ने इसे हिंदू धर्म और संस्कृति को बदनाम करने की साजिश बताया।
शिवसेना के अनुसार यह शब्द हिंदुत्व को आतंकवाद से जोड़ने की एक राजनीतिक चाल थी।
2025 का फैसला और फिर उठे सवाल
एनआईए कोर्ट ने 31 जुलाई 2025 को अपने फैसले में कहा कि
“इस मामले में आरोपियों के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं मिले।”
इसके बाद देवेंद्र फडणवीस, बाबा रामदेव, आरएसएस समेत कई नेताओं ने राहत की सांस ली और कहा कि “आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। भगवा आतंकवाद एक राजनीतिक गढ़ंत था।”
हालांकि, पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने कहा:
“अगर ये आरोपी निर्दोष हैं तो फिर धमाका किसने किया?”
एक पूर्व एटीएस अधिकारी का बड़ा दावा
पूर्व एटीएस अधिकारी महबूब मुजावर ने एक सनसनीखेज दावा किया है कि उन्हें मालेगांव केस में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को गिरफ्तार करने के लिए दबाव डाला गया था।
उन्होंने कहा कि उन पर ‘भगवा आतंकवाद’ की स्क्रिप्ट गढ़ने का निर्देश दिया गया था। यह खुलासा जांच एजेंसियों की भूमिका और उस समय की राजनीति पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
शब्द का प्रभाव और सामाजिक दृष्टिकोण
‘भगवा आतंकवाद’ एक ऐसा शब्द बन गया जिसने समाज को दो ध्रुवों में बांट दिया।
जहां एक ओर कुछ बुद्धिजीवी इसे आतंकवाद के खिलाफ निष्पक्षता का प्रतीक मानते हैं, वहीं बहुसंख्यक हिंदू समाज ने इसे अपमान और साजिश माना।
बाबा रामदेव ने हालिया फैसले के बाद कहा:
“जिसने भी यह शब्द गढ़ा, उसने पाप किया। अब कोर्ट के फैसले ने उस पाप का प्रायश्चित कर दिया है।”
निष्कर्ष: राजनीति, धर्म और न्याय के बीच फंसी एक सच्चाई
‘भगवा आतंकवाद’ सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि धर्म और आतंकवाद को जोड़ने की खतरनाक कोशिश का प्रतीक बन गया।
2025 का फैसला भले ही आरोपियों को निर्दोष घोषित करता है, लेकिन यह भी स्पष्ट करता है कि:
- न्याय प्रक्रिया में राजनीति का हस्तक्षेप कितना गहरा हो सकता है।
- कैसे एक शब्द पूरी धार्मिक और सामाजिक छवि को प्रभावित कर सकता है।
- और सबसे बड़ा सवाल – “अगर वे दोषी नहीं थे, तो असली अपराधी कौन है?”
इन सवालों के जवाब आज भी अधूरे हैं, और शायद आने वाले वर्षों में भी बहस जारी रहेगी।
