साल 1999। कारगिल की ठंडी हवाओं में बारूद की बू घुल चुकी थी। बर्फ से ढकी चोटियों के पीछे एक मिशन था — इतना खुफिया कि सेना के अंदर भी बहुत कम लोगों को इसकी जानकारी थी। और इस मिशन पर भेजा गया था कैप्टन आरव राठौर, भारतीय सेना का सबसे साहसी और भरोसेमंद अधिकारी।
पर इस बार मिशन सिर्फ दुश्मन के खिलाफ नहीं था… बल्कि अपने ही किसी अपने के खिलाफ भी था — लेकिन आरव को इसका अंदाज़ा नहीं था।
अध्याय 1: एक गुप्त आदेश
“तुम्हारा मिशन दुश्मन की सीमा के भीतर जाकर एक सैटेलाइट कम्युनिकेशन टावर को उड़ाना है। पर ध्यान रखना, इस ऑपरेशन में भरोसा सिर्फ खुद पर करना,” ब्रिगेडियर की आवाज़ में एक अजीब-सी गंभीरता थी।
आरव चौंका — “क्या मतलब सर? मेरे साथ कौन होगा?”
“लेफ्टिनेंट कबीर शर्मा,” ब्रिगेडियर ने कहा।
आरव के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई — कबीर उसका दोस्त था, बैचमेट और एक ज़बरदस्त फौजी। पर ब्रिगेडियर की आंखों में कुछ था… जैसे कुछ छुपा हो।
अध्याय 2: बर्फ, बंदूक और बेवफाई
देर रात दोनों LOC पार कर चुके थे। आसमान में बादल थे, नज़रें मुश्किल से दस मीटर तक जा रही थीं। बर्फ की चादर के नीचे मौत बिछी थी — और ऊपर से समय का दबाव।
आरव ने चारों ओर नज़र दौड़ाई — हर हरकत पर सतर्क।
टावर नज़दीक था, और दोनों जवान एक खाली बंकर में छिपे हुए थे। कबीर ने धीमे से कहा, “यही मौका है आरव, चलो जल्दी करते हैं।”
आरव ने जैसे ही बैग से डेटोनेटर निकाला, तभी — “क्लिक!”
एक बंदूक की नली उसकी कनपटी से सटी थी।
“कबीर?” आरव की आवाज़ कांप उठी।
“तू बहुत समझदार है, लेकिन ज़्यादा भरोसेमंद नहीं। अफ़सोस… आज तुझे यहीं दफना दूंगा।” कबीर ने आंखें तरेरीं।

अध्याय 3: धोखा या चाल?
गोली चली — आरव ज़मीन पर गिर गया। खून बह रहा था… लेकिन उसने अपनी आंखें बंद नहीं कीं।
कबीर ने उसे मरा समझकर भागने की कोशिश की। लेकिन आरव की घड़ी में एक खास ट्रैकिंग चिप थी — सेना के पास उसकी लाइव लोकेशन जा रही थी।
ज़ख्मी हालत में भी, आरव ने धीरे-धीरे बॉडी खिसकाई, हाथ बढ़ाया, डेटोनेटर दबाया।
धड़ाम!!!
दुश्मन का टावर आसमान में उड़ गया। मिशन सफल हो गया, लेकिन आरव बेहोश हो चुका था।
अध्याय 4: परछाईं की वापसी
छह दिन बाद उसे पाकिस्तान की एक अज्ञात जेल से छुड़ाया गया। चेहरा सूजा हुआ, शरीर टूटा हुआ — लेकिन आँखों में आग अब भी ज़िंदा थी।
कबीर गायब था।
सेना को कुछ भी नहीं मिला — कोई रिकॉर्ड, कोई संदेश, कुछ नहीं। कबीर जैसे हवा में घुल गया हो।
ब्रिगेडियर ने एक दिन आरव से कहा, “तुम्हें लगता है ये सिर्फ पैसे का लालच था?”
आरव ने सिर हिलाया, “नहीं सर, ये कुछ बड़ा है। कोई नेटवर्क… कोई गहरी साजिश।”
अध्याय 5: गद्दार की परछाईं
छह महीने बाद दिल्ली में एक संदिग्ध गतिविधि पकड़ी गई — ISI एजेंट्स की एक गुप्त बैठक।
जब खुफिया तस्वीरें आईं, तो आरव का खून जम गया — उसमें एक चेहरा था, जो अब भी मुस्कुरा रहा था… कबीर।
पर अब कबीर सिर्फ एक गद्दार नहीं था, वो एक शातिर मास्टरमाइंड बन चुका था।
उसका प्लान था — दिल्ली मेट्रो स्टेशन पर ब्लास्ट, हज़ारों लोगों की जान लेने वाला हमला।
अध्याय 6: अंतिम टकराव
सेना ने एक स्पेशल ऑपरेशन बनाया — “ऑपरेशन प्रेत”।
रात 2 बजे, एक पुरानी फैक्ट्री को चारों ओर से घेर लिया गया। अंदर से गोलियों की आवाज़ें आने लगीं। ऑपरेशन टीम घुस चुकी थी।
और सामने आया — कबीर।
चेहरा अब पहले जैसा मासूम नहीं था — एक ठंडा, शातिर और नफरत भरा चेहरा।
“तू फिर जिंदा है?” उसने कहा।
आरव ने धीरे से जवाब दिया — “और तू अब भी जिंदा है, ये अफसोस है।”
दोनों आमने-सामने। गोलियाँ चलीं। दीवारों से टकरा कर आवाज़ें गूंजती रहीं।
आख़िरकार, कबीर का गोली आरव के सीने को छूती हुई निकली, लेकिन आरव ने उसे घुटनों पर ला दिया।
“क्यों किया ये सब?” आरव ने पूछा।
“इस सिस्टम से मुझे नफ़रत थी… मैं सिर्फ एक मोहरा था। अब मैं खेल का खिलाड़ी हूँ,” कबीर हँसा।
आरव ने उसे हथकड़ी पहनाई — “पर अब तू सिर्फ एक कैदी है… और हमेशा रहेगा।”
अंत
कबीर को कोर्ट मार्शल के बाद उम्रकैद की सजा दी गई।
आरव वापस युद्धभूमि पर लौट गया। पर इस बार उसकी आंखों में एक नई गहराई थी — एक घाव जो कभी नहीं भरेगा।
