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सोहराय पर्व के चौथा दिन : जाले (Jale)

सोहराय पर्व के चौथा दिन : जाले (Jale) – आदिवासियों की अनोखी लोक परंपरा और सामूहिकता का प्रतीक जब हम भारतीय लोक परंपराओं की गहराई में उतरते हैं, तो हमें एहसास होता है कि हमारे आदिवासी समाज ने प्रकृति और आपसी भाईचारे को कितने सुंदर ढंग से संजोकर रखा है। अगर आप झारखंड, बंगाल या…

सोहराय पर्व के चौथा दिन

सोहराय प्रव के तीसरा दिन :खूँटाव (Khuntaw)

सोहराय पर्व: खूँटाव (Khuntaw) – परम्परा, रोमांच और पशुधन की अनूठी पूजा जब आप झारखंड, पश्चिम बंगाल या ओडिशा के आदिवासी क्षेत्रों में ढोल और मांदर की गूंज सुनते हैं, और हवा में धुले हुए चावल और गुड़ की भीनी खुशबू तैरने लगती है, तो समझ जाइये कि प्रकृति और पशु-प्रेम का सबसे बड़ा त्यौहार…

सोहराय पर्व के तीसरे दिन

सोहराय पर्व का दूसरा दिन: दका (Daka)

सोहराय पर्व का दूसरा दिन: दका (Daka) – पशु धन और प्रकृति की अनूठी पूजा क्या आपने कभी उस अहसास को महसूस किया है जब धान की नई फसल घर आती है और पूरा गांव एक अजीब सी खुशी और उत्साह से भर जाता है? अगर आप झारखंड या उसके आसपास के आदिवासी क्षेत्रों से…

सोहराय पर्व का दूसरा दिन: दका (Daka)

सोहराय पर्व के पहला दिन :उम (Um)

सोहराय पर्व के पहला दिन :उम (Um) — शुद्धि, स्नान और गोड़ैत द्वारा देवताओं का आह्वान अगर आप झारखंड, बंगाल या ओडिशा के आदिवासी अंचलों, विशेषकर संथाल परगना की माटी से जुड़े हैं, तो ‘सोहराय’ शब्द सुनते ही आपके मन में मांदर की थाप और धान की नई बालियों की महक ताज़ा हो गई होगी।…

सोहराय पर्व के पहला दिन :उम (Um)

सोहराय का 5वां दिन: हकू कातकोम

सोहराय का 5वां दिन: हकू कातकोम (Hako Kaatkom) का महत्व और परंपरा झारखंड और आसपास के आदिवासी क्षेत्रों में जब धान की बालियाँ सुनहरी हो जाती हैं और हवा में हल्की ठंडक घुलने लगती है, तब आगमन होता है ‘सोहराय’ का। यह केवल एक त्यौहार नहीं है; यह प्रकृति, पशुधन और मानव के बीच के…

सोहराय का 5वां दिन